विगत दिनों दुर्ग में आयोजित एक कार्यक्रम में हिन्दू जीवन दृष्टि एवं पर्यावरण विषय पर प्रकाश डालते हुए वक्ता डॉ.सच्चिदानंद जोशी, कुलपति, कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर नें कहा कि हमारी हिन्दू संस्कृति में विशिष्ठ वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय चिंतन है. वैज्ञानिक जिस गॉड पार्टिकल की अवधारणा को सिद्ध कर रहे हैं उसे हमारे वेदो नें सदियों पहले ही सिद्ध कर लिया था. उन्होंनें हिन्दू जीवन पद्धति को विभिन्न वैज्ञानिक सिद्धांतों के साथ जोड़ते हुए बताया कि वेदों में तमाम बातें कही गई हैं जिसे विज्ञान अब सिद्ध कर रहा है. उन्होंनें अलबर्ट आंइन्टांईन को कोट करते हुए कहा कि कोई भी विज्ञान धर्म के बिना लंगड़ा है और कोई भी धर्म विज्ञान के बिना अंधा. सभा को संबोधित करते हुए बिरसराराम यादव नें गांव में बादल गरजने पर सब्जी काटने वाले हसिये को आंगन में फेंकने की परम्परा का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारी भारतीय पारंपरिक ज्ञान में विज्ञान समाहित है. हमारे चिंतन और व्यवहार का आधर पूर्ण वैज्ञानिक है.

उन्होंनें एकलव्य कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि एकलव्य नें गुरू द्रोण से अर्जुन के समान होने का वरदान मांगा था. एकलब्य नें प्रत्यक्षत: इस बात को झुठला दिया था कि पृथ्वी में अर्जुन के समान धनुर्धर कोई नहीं है. किन्तु अर्जुन सब्यसांची धर्नुधर था अर्थात अर्जुन बांयें हांथ की उंगलियों और अंगूठे से धनुष की प्रत्यंचा में तीर चलाता था. एकलब्य दाहिने हाथ की उंगलियों और अंगूठे से धनुष की प्रत्यंचा में तीर चलाता था. द्रोण नें एकलव्य का अंगूठा लेकर उसे अर्जुन के समान सव्यसांची बनाया. इसके अतिरिक्त भारत में दलित, त्यौहार-पर्व-उत्सव में अंतर, मोक्ष-मुक्ति का अर्थ, हिन्दू की परिभाषा आदि विषयों को भी उन्होंनें सहज ढंग से समझाया.
