हमारे पिछले फेसबुक स्टेट्स ‘पवित्र उंगलिंयॉं‘ में कमेंटियाते हुए प्रो.अली सैयद नें हमारी पर्यवेक्षणीयता की सराहना की थी. हम भी सोंचें कि ऐसा कैसे हुआ, व्यावसायिक कार्य हेतु दिल्ली, ट्रेन से आना जाना तो लगा रहता है पर ऐसी पर्यवेक्षणीयता हर बार नहीं होती. बात दरअसल यह थी कि मोबाइल चोरी चला गया था, ना कउनो फेसबुक, ना ब्लॉग पोस्ट, ना मेल सेल, ना एसएमएस, ना गोठ बात. तो कान आंख खुले थे जब किटिर पिटिर करने को मोबाईल ना हो तो, खाली मगज चलबे करी.
त हुआ का कि, हमारे सामने के सीट म एक नउजवान साहेब बइठे रहिन. टीटी टिकस पूछे त, बताईन हम रेलवे के साहब हूं. हम देख रहे थे, बिल्कुल साहेब जइसे दिख भी रहे थे. हमने सोंचा भले साहब की रूचि हम पर ना हो फिर भी समें काटे खातिर उनसे बात शुरू की जाए. बाते म पता चली कि साहेब भारतीय रेलवे अभियांत्रिकी सेवा के अधिकारी हैं, झांसी में पदस्थ हैं, नाम है अहमद, लखनउ के हैं.

हम सोंचे बड़ बुडबक है यार उ पांडे हम तेवारी ऐतना नइ बुझाता. फिर खामुस खा गए. थूंक घुटके फिर बोले ‘उ बड़ा उम्दा हिन्दी ब्लागर हैं और हम भी ब्लॉगर हैं एइ कारन पहचान है.‘ अहमद साहेब नें दूसरा क्बेसचन दागा, ‘मतलब आपका ये टिकट पाण्डेय साहब के अप्रोच से कनफर्म हुआ है.‘ हम चकराए कि इनको कईसे पता चला कि अपरोच से टिकट कनफर्म हुआ. कने लगे, ‘लिस्ट में आपके नाम के आगे एच. ओ. लिखा है, दो दिन पहले बना टिकट कहीं इन दिनों बिना अपरोच के कनफर्म होता है भला.‘ हमने कहा ‘अरे नहीं भाई, ई तो हमारे कलाईंटें न कटवाया है, कउनो मंत्री संत्री से करवाए होंगें कनफर्म. हमको नइ पता.‘ उन्होंनें कहा ‘ओह!‘
इसी बात पर अहमद साहब नें टिकट कनफर्म कराने आने वाले मित्रों और रिश्तेदारों के फोन की कथा सुनाई और अपनी बेबसी का खुलासा किया. हमने भी कहानियों को सुनते हुए उन्हीं की तरह बार बार बोला ‘ओह!‘
तब तक अहमद साहब प्रवीण पाण्डेय जी का ब्लॉग ‘न दैन्यं ना पलायनम‘ माबाईल में ढूंढ निकाले थे और प्रशन्नता से बांचने लगे... खामोशी.
कुछ देर बाद हमें लगा के इन पर अब अपना रौब दाबा जाए. हमने बताया के ‘हमहू हिन्दी ब्लॉगर हैं अउर हमारी भी वैश्विक पहचान है. फलां फलां सम्मान मिला है, ये है, वो है, माटी वाले हैं, कुल मिला कर हम हम हैं.‘
‘वाह भई!‘ तब तक अहमद साहब हमारा ब्लॉग भी मोबाईल में चाप लिए थे. आपके ब्लॉग में तो दूसरों के भी पोस्ट हैं. हम तनि झेंपियाते हुए बोले ‘का है ना कि हम आजकल बहुत बियस्त रहते हैं इस कारन पोस्ट नहीं लिख पाते...‘ ये तो गनीमत था कि अहमद साहब ब्लॉगर नहीं थे नहीं तो हमारी वैश्विक पहचान दुई मिनट में धूल में मिल जाती, हालांकि एसी कूपे में मिलाने लायक धूल नहीं थी इस बात का भी सकून था. उनके हाव भाव से पता चल रहा था कि हमारे बताने के बावजूद वे हमें असामान्य कतई नहीं मान रहे थे जबकि हम अपनी वैश्विकता सिद्ध करना चाह रहे थे.
बात ना बनते देख हमने एक चांस अउर लिया. हमने उन्हें बताया कि ‘इलाहाबाद में हमारे एक और पहचान के हैं. रेलवे में बड़का पोस्ट में है, नाम है उनका ज्ञानदत्त पाण्डेय.‘ अहमद साहब उपर पंखे की ओर देखते रहे, लगा वे उसकी रफ़तार बढ़ाना चाह रहे थे.

आगे अहमद साहब नें बताया कि जिनको उन्होंनें फोन किया था वे ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की काफी प्रशंसा कर रहे थे, कह रहे थे कि ‘बहुतै अच्छे अदमी हैं, कबि हैं मने गियानी हैं..‘
बातों बातों में झांसी टेसन आ गया, अहमद साहब हाथ मिलाकर दरवाजे की ओर चले गए. हम भी दुर्ग उतर गए, फिन अब तक सोंच रहे हैं. ज्ञानदत्त जी तो गद्यकार हैं, उनके कवि होने की जानकारी हमें नहीं है. संभवतः सामने वाले नें कवि होने का मतलब बौद्धिकता से लगाया होगा, मने बौद्धिकता का पैमाना कविता है.
संजीव तिवारी