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बस्‍तर : रिसता खून

पता नहीं कौन सा साल था वह, बचपन में उम्र क्या थी पता नहीं, वक्त भी पता नहीं, पर उजाला था आसमान में. उनींदी आंखों जब खुली तो सिर में खुजली हो रही थी. हाथ जब बालों में गई तो दर्द हुआ सिर में, दर्द हुआ उंगलियों में, कुछ चिपचिपा महसूस हुआ. झट बालों से बाहर निकले उंगलियों को जब अंगूठे नें छुआ, तो फिर दर्द हुआ. अंगूठे नें महसूस किया, आंखों नें देखा, चिपचिपे द्रव के साथ. कांछ उंगलियों में, सिर में, शरीर में, बाबूजी, दीदी के कपड़ों पर, बस में, चारो तरफ बिखरे थे. बाबूजी के सिर से भी खून बह रहा था पर उन्होंनें मुझे हिफाजत से पकड़ा था. बाहर पेंड ही पेंड, कुछ में लटो में आम, शायद जंगल था. नीचे गहरी खाई, बस का एक पहिया हवा में. पेंड से टकरा गई थी बस, खिड़कियों के शीशे हमारे शरीरों में चुभते हुए बिखर गई थी सड़क पर. बाबूजी नें कहा था एक्सीडेंट हो गया!. मेरे सिर के बालों में घुसे महीन कांछ के तुकड़े, बूंद बूंद खून सिरजा रहे थे. उंगलिंयॉं बार बार सिर खुजाने को बालों की ओर लपकती और बाबूजी मेरा हाथ रोक देते. एक बड़ा तुकड़ा भी गड़ गया था सिर में. दर्द से, जाहिर है, मेरे आंसू निकल रहे थे और मुह से नाद. अगले कुछ पलो में बस से सब अपना अपना सामान लेकर उतर गए. नीचे सड़क पर कांछ के साथ बस के आस पास बिखरे थे आम. बाबूजी के एक हाथ में भारी बैग दूसरे में मेरा हाथ. मैं दर्द भूलकर आम उठाने झुका और एक आम उठा भी लिया. बाबूजी नें अपने बंगाली के कंधे से सिर से आंख में बहते हुए खून को पोंछा और मुझे एक भद्दी सी छत्तीसगढ़ी गाली दी. मर रहे हैं और तुझे आम सूझा है. उन्होंनें शब्दों को आगे जोड़ते हुए कहा, तब तक मेरे खून सने हाथों नें आम को मुह तक पहुचा दिया था. दूसरी बस कब आई, कब हम जगदलपुर पहुंचे, मुझे नहीं पता.

किन्तु आज भी, जब कभी भी, बस्तर के जंगलों में हो रहे मार काट में किसी मानुस के खून बहने की खबर, समाचारें लाती है. मेरी उंगलियॉं मेरे सिर के बालों में अनायास ही चली जाती है. उंगलियॉं महसूसती है, चिपचिपा रिसता खून, और सिर में दर्द होने लगता है.
.. तमंचा रायपुरी.

क्या इंटरनेट परोस रहा है नक्सल विचार धारा ??

गूगल सर्च में यदि आप अंग्रेजी एवं हिन्दी में ‘नक्सल’ शब्द को खोंजें तो लगभग पांच लाख पेज की उपलब्धता नजर आती है. इन पांच लाख पेजों पर सैकडों पेजों के लिखित दस्तावेज, चित्र व फिल्मो के क्लिपिंग्स उपलब्ध हैं जिनमें से कईयों मे, लाल गलियारे को स्थापित करने वाली विचारधारा को हवा दी गई है. इन पेजों में घृणा का बीज बोंते लोग भी हैं तो मावोवादी विचारधारा के विरूद्ध आवाज उठाने वाले लोग भी हैं जो टिमटिमाते दिये के सहारे इस हिंसक विचारधारा के अंधेरे को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं.

सैकडों व हजारों की संख्या में प्रतिदिन क्लिक होने वाले. खूब पढे जाने वाले इन ब्लागों में शहीद कामरेडों के चित्रों, छत्तीसगढ में हुए तथाकथित पुलिस बर्बरता के किस्से, फर्जी मुठभेडों व शोषण के शब्द चित्रों, बलत्कार के वाकयों को बयां करते लेखों व विचारों की अधिकता है. इसके साथ ही मानवतावा‍दी विचारधारा वाले व हिंसा से विरत रहने के अपील करते लेखों व नक्सल समस्या पर सार्थक विमर्श करते ब्लागों की भी कतारें  हैं. इसके अतिरिक्त नेट में फैले तथाकथित मानवतावादी, खालिस मावोवादी, नक्सलवादी व जनवादियों एवं बस्तर, नक्सल व छत्तीसगढ के मुद्दों पर बहस करने वालों या इन पर कलम चलाने वालों की भी लम्बी फेहरिश्त है. समाचार सूचना के अन्य माध्यम व पिंट मीडिया को जिसके लिये सेंसर, नैतिक कर्तव्य व सरकारी मंशा के साथ ही बहुसंख्यक जनता का ध्यान रखते हुए लेखन व प्रकाशन करना पडता है. वहीं इन पोर्टलों व ब्लागों में सीधे जमीन से उपजे समाचार व आन्दोलित कर देने वाले विचारों का पुलिंदा वीडियों, आडियो व फोटो सहित नेट में प्रतिदिन प्रकाशित हो रहे हैं. पुलिस संभावित आरोपियों के घरों से नक्सल साहित्य के नाम पर तलासी में सिर खपाती रही है और यहां ये हाईटेक लोग अपने दस्तावेज आनलाईन कर मुफ्त में हर किसी के लिए उपलब्ध करा रहे हैं. खून को खौलाने के हर हथकंडे अपनाए जा रहे हैं और वाद व विचारधारा के शब्दजाल बुनकर जनमानस को अपने पक्ष में करने का चक्र-कुचक्र जारी है.

वर्तमान में छत्तीसगढ व नक्सली मुद्दों पर ज्यादातर अंग्रेजी में पोर्टल व ब्लाग उपलब्ध हैं. जिनमें ब्लागों की संख्या अधिक है. विश्व सुलभ भाषा अंग्रेजी में होने के कारण बस्तर या छत्तीसगढ के नक्सल व सलवा जुडूम के संबंध में जो जानकारी यहां है वह संपूर्ण विश्व के पाठकों तक उसी रुप मे सर्वसुलभ हो जा रही है. यह भी हो सकता है कि ये ब्लाग के लेखक छत्तीसगढ में ही बैठकर अपना विरोध और अपने चिंतन को तथ्यात्मक रूप से सप्रमाण (ऐसा उनका मानना है) वहां परोस रहे हों. जैसा वहां प्रस्तुत हो रहा है वैसा ही विश्व बौद्धिक समाज उसे ग्रहण कर रहा है और छत्तीसगढ शासन व पुलिस के विरूद्ध मानसिकता तैयार हो रही है. इंटरनेट में फैलाये जा रहे इस तथाकथित वैचारिक क्रांति की संवेदनशीलता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि विगत दिनों पुलिस प्रमुख व नक्सली प्रवक्ता गुडसा उसेडी एवं सुभ्रांशु चौधरी के बीच जो विमर्श का दौर छत्तीसगढ समाचार पत्र में प्रकाशित हो रहे थे उसमें पुलिस प्रमुख विश्वरंजन जी नें लिखा था कि उन्हे इंटरनेट में हो रहे छत्तीसगढ शासन व पुलिस विरोधी हलचलों की जानकारी गूगल रीडर व एलर्ट से त्वरित रूप से हो जाती है. यानी डीजीपी स्वयं नक्सल विचारधारा के नेट दस्तक के प्रति संवेदनशील हैं. और ... नेट में ऐसे दस्तक प्रतिदिन हो रहे हैं.

सलवा जुडूम,डॉ.बिनायक सेन, अजय जीटी का मसला संपूर्ण विश्व में किस कदर छाया इसका उदाहरण बर्कले मे सामने आया. अमेरिका के सर्वाधिक प्रतिष्ठित बर्कले विश्वविद्यालय में आयोजित एक सम्मेलन मे  संपूर्ण विश्व के चिंतको के सामने छत्तीसगढ के डीजीपी विश्वरंजन जी के विरूद्ध वहां के छात्रो ने ‘विश्वरंजन वापस जावो’ जैसे नारे लगाए और तख्तियां टांगनें पर उतारू हो गए. यह सब पूर्वनियोजित तरीके से नियमित रूप से इंटरनेट के माध्यम से छत्तीसगढ विरोधी खबरें विश्व के कोने कोने में फैलाये जाने से हुआ. बर्कले विश्वविद्यालय कैलीफोर्नियां में दक्षिण एशियाई संगठन के छात्र, प्रिस्टन, हार्वड, येल और अन्य जानेमाने विश्वविद्यालयों के छात्र व शिक्षक एक सुर में छत्तीसगढ शासन व पुलिस के विरोध में खडे हो गए. हालांकि छत्तीसगढ से उस कार्यक्रम में शिरकत करने वाले डीजीपी एवं छत्तीसगढ के संपादक सुनील कुमार जी नें दमदारी से अपना पक्ष रखा था. विदित हो कि संपूर्ण विश्व में इस बडे आयोजन का हो – हल्ला हुआ था, विश्व के प्रबुद्ध समाज इससे वाकिफ हुआ था या इससे वाकिफ कराया गया था. विदेशों में खासकर इंडोनेशिया के महीदी, सीयरालियोन के कामजोर, सूडान के जंजावीद, रवांडा, चाड, आफ्रीका व विश्व के तमाम जन मिलिशियाओं के चिंतकों व शुभचिंतकों तक बस्तर की संवेदनाओं को बांटने एवं उनके समर्थकों/विचारकों को बस्तर के विषय में गंभीर होने एवं अपना समर्थक बनाने में कारगर माध्यम बनने के लिए इंटरनेट बेताब है, यह बर्कले में स्पष्ट हो गया.

इन परिस्थितियो मे नेट मे सक्रिय छत्तीसगढ के हितचिंतको का चिंतन आवश्यक है. क्योकि वर्तमान मावोवादी विचारधारा किसी भौतिक बारी बखरी से सुविधाविहीन नेतृत्व के द्वारा आरंभ होकर अब पूर्णतया सुविधा सम्पन्न एवं तकनीकि सूचना तंत्रों के बेहतर जानकार लोगों के नेतृत्व में फल-फूल रही है. अब नक्सल विचारधारा के पोषक इंटरनेट के द्वारा संपूर्ण विश्व में अपने वाद को उचित ठहराने के उद्देश्य से सक्रिय हैं. यह विश्वव्यापी त्वरित प्रभावी सूचना तकनीकि बहुत ही सहज व सरल है इस कारण उनकी बातों को स्वीकारने वाले एवं उनके पक्षधर पाठकों की संख्या में दिनो दिन इजाफा हो रहा है. वे अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बस्तर एवं देश के अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्र की तस्वीर जिस रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, उनके पाठक उसी रूप में उसे स्वीकार कर रहे हैं और तथाकथित क्रांति के इस यज्ञ में अपने अपने सामर्थनुसार हबि डालने को उत्सुक नजर आ रहे हैं. दूसरी तरफ इस बात की सच्चाई उजागर करने वालों की जमात इंटरनेट की दुनिंया में कम है. यदि है भी तो वे स्पष्ट रूप से सरकार या पुलिस से प्रायोजित प्रतीत हो रहे हैं जिसके कारण उनकी विश्वसनीयता सामान्य पाठक के लिए संदिग्ध है.

पिछले दिनों भिलाई के आसपास छुपाये गए हथियारों के जखीरों के मिलने पर पूर्व मंत्री भूपेश बघेल जी द्वारा शासन व पुलिस की भर्त्सना एवं न‍क्सलियों के विरूद्ध वैचारिक क्रांति का जो शंखनाद किया था उस वक्त समाचार पत्रों नें हथियारों के इस खेल को ‘नक्सलियों के शहरी नेटवर्क’ का नाम दिया था. डीजीपी विश्वरंजन जी नें भी पिछले दिनों भोपाल में कहा था कि भारत में कुल हिंसक वारदातों में से 95 प्रतिशत हिस्सा मावोवादी हिंसा है. इसके साथ ही उन्होनें यह भी कहा कि नक्सलियों के दो तरह के कार्यकर्ता होते हैं एक पेशेवर और दूसरे जो अंशकालिक तौर पर और कोई दूसरा काम करते हुए उनका शहरी नेटवर्क. मेरी समझ के अनुसार यह शहरी नेटवर्क संचार तंत्र का भरपूर उपयोग करता है और सहीं मायनों में यही धुर जंगल में कैम्प कर रहे लोगों तक विचारों को थोपता है. व्यापक रूप से इन्ही शहरी नेटवर्कों का माइंड वाश किया जाना आवश्यक है. क्योकि शहरी नेटवर्क के बिना नक्सली पंगु हो जावेंगें. शायद इसे ही विगत दिनों विचारकों के द्वारा ‘स्‍ट्रेटेजिक हैमलेटिंग’ कहा-समझा गया. मेरा विचार है कि इन शहरी नेटवर्कों के द्वारा जिस प्रचुरता से इंटरनेट में नक्सल व मावो समर्थित लेख व सलवा जुडूम के विरोध में लेख परोसे जा रहे हैं उसी प्रचुरता से उन विचारधाराओं के समीक्षात्मक व वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करते हुए विचार व समाचार नेट में भी उपलब्ध हों. ताकि दुनिया में छत्तीसगढ की सही तस्वीर प्रस्तुत हो सके.

संजीव तिवारी

छत्तीसगढ के असुर: अगरिया

जनजातीय समाज के लोग अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति से अपनी संस्कृति, परंपरा व प्रकृति को धरोहर की भांति निरंतर सहेजते रहे है, एवं समयानुसार इन्हें सवांरते भी रहे है. आज के विकसित समाज के मूल में इस भूगोल के प्राय: सभी हिस्‍सों में, जनजातीय संस्कृति उनकी परंपरांए उनमें प्रचलित मिथक और विश्‍वास गहराईयों में सुसुप्‍त किन्‍तु जीवंत हैं. छत्तीसगढ सनातन काल से ही इन जनजातीय समाज का बसेरा रहा है जहां संस्कृतियां फली फूली हैं. इन्ही आदिम जनजातियों में से अगरिया ऐसी जनजाति है जिनका जीवन लोहे और आग का लयबद्धत संगीत है.

The  Tribes and Castes of the Central Provinces of India By R.V. Russell   


छत्‍तीसगढ़ सहित भारत के विभिन्‍न क्षेत्र में निवासरत अगरिया लोग अपनी उत्पत्ति को वैदिक काल से संबद्ध मानते हैं. जब समुद्र मंथन हुआ और देवताओं के द्वारा संपूर्ण अमृत अकेले प्राप्त कर लेने हेतु चतुर चाल चले गए तब असुरों नें अमृत घट चुरा लिया था. जिसे छल से स्त्री वेष धर कर विष्‍णु नें वापस प्राप्त किया और भागने लगे तब असुरो के देवता राहु नें उनका पीछा किया जिससे पीछा छुडाने के लिए सूर्य देव नें चक्र से राहु का सिर धड से अलग कर दिया. राहु का धड विष्‍फोट के साथ पृथ्वी पर गिरा और जहां जहां उसके शरीर के तुकडे गिरे वहां वहां पृथ्वी में असुर पैदा हुए. धड विहीन राहु आकाश में भ्रमण करते हुए प्रतिशोध स्वरूप सूर्य को अवसर प्राप्त होने पर ग्रसते रहता है. यही राहु अगरियों का आदि देव है. जो कालांतर में इनके नायक लोगुंडी राजा एवं ज्वालामुखी, करिया कौर हुए जो अपने अलग-अलग रूप में आज भी पूजे जाते हैं.

अगरियों से परे तथ्यात्मक संदर्भों का अवलोकन करने पर वैरियर एल्विन कहते हैं कि ‘उनकी उत्पत्ति अस्पष्‍टता के गर्त में है किन्तु पौराणिक असुरों से अपने आप को जोडने की उनकी धारणा रोचक है.’ लोहे के इतिहास पर यदि नजर डालें तो युद्धों में मारक अश्‍त्रों का उपयोग ई.पू.2000 से 1000 के बीच से आरंभ है. प्राचीन इतिहासकार हेरोडोट्स लिखता है कि जेरेक्सेस की सेना के भारतीय योद्धा लोहे के बडे फलों वाले भाले से सुसज्जित थे. यानी भारतीय लोहे का सफर विदेशों तक तब भी हो रहा था. भारतीय लोहे की गुणग्राह्यता के संबंध में डब्लू.एच.शैफ नें द इस्टन आयरन ट्रेड आफ रोमन एम्परर में लिखते हैं कि प्राचीन रोम में तद्समय ज्ञात सर्वोत्तम किस्म के स्टील का आयात भारत से होता था. अयस्कों को आदिम विधि से पिघलाकर बनाया गया लोहा तद्समय के बहुप्रतिष्ठित समाज के लिए सर्वोत्तम स्टील रहा है. और संपूर्ण विश्‍व में इस सर्वोत्तम स्टील को बनाने वाले भारत के अगरिया रहे हैं.

अरबी इतिहासकार हदरीषी नें भी लोहे के उत्पादन में हिन्दुओं की प्रवीणता को स्वीकारते हैं वे कहते हैं कि हिन्दुओं के बनाए गए टेढे फलों वाली तलवारों को किसी अन्य तलवारों से मात देना असंभव था. उन्होंनें आगे यह भी लिखा कि हिन्दुस्तान में अयस्कों से लौह निर्माण व हथियार निर्माण करने के निजी कार्यशालाओं में विश्‍व प्रसिद्ध तलवारें ढाली जाती थी. एक और इतिहासकार चार्डिन कहता है कि पर्शिया के लडाकों के लिए बनने वाले तलवारों को ढालने के लिए भारतीय लोहे को मिलाया जाता था क्योंकि भारतीय लोहा पर्शियन के लिए पवित्र था और उसे श्रद्धा से देखा जाता था जिसे इतिहासकार डूपरे नें भी स्वीकार किया था.

The Tribes and Castes of the Central Provinces of India By R.V. Russell
अन्य उल्लेखों में फ्रांस का व्यापारी ट्रेवेनियर को गोलकुंडा राज्य के लौह कर्मशालायें बेहद पसंद आई थी जहां तलवारें, भाले, तीर ढलते थे, उसे गोलकुंडा में ढलने वाले बंदूक के पाईप भी बहुत अच्छी गुणवत्ता के नजर आये थे जो बारूदों के प्रभाव से पश्चिमी देशों के बंदूकों की तरह फटते नहीं थे. ये सारे संदर्भ नेट में यत्र-तत्र बिखरे पडे हैं एवं भारतीय पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं किन्तु हमें अपना ध्यान अगरियों पर ही केन्द्रित रखना है इस कारण लोहे पर अन्य जानकारी यहां देनें की ज्यादा आवश्‍यकता नहीं हैं.  .............................

जनजातीय इतिहास के संबंध में रसेल व हीरालाल की दुर्लभ लेखनी इंटरनेट में उपलब्‍ध है जिसे बाक्‍स में दिये गये लिंक से पढा जा सकता है.                                   

अगरिया पर मेरी कलम घसीटी के अंश
संजीव तिवारी

कौन है आदिवासियों के असल झंडाबरदार

छत्‍तीसगढ़ के समाचारों की सुर्खियों में पिछले दिनों से एस्‍सार के नक्‍सली सहयोग की समाचारें प्रमुखता से प्रकाशित हो रही हैं। रोज इस संबंध में कुछ ना कुछ छप रहा है और इस वाकये की तह में क्‍या है यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पा रहा है। समाचार के मूल में यह है कि 11 जनवरी 2010 को विकीलिक्‍स नें खुलासा किया था कि छत्‍तीसगढ़ के नक्‍सलियों को एस्‍सार द्वारा अपने कार्य को सुचारू रूप से चलाने एवं दखल ना देने के लिए नक्‍सलियों को भारी मात्रा में मुद्रा दिया जाता है साथ ही यह भी जानकारी दी गई थी कि नक्‍सलियों को फिलिपीनों विद्रोहियों एवं एलटीटीई के द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बाद से ही छत्‍तीसगढ़ पुलिस एस्‍सार और नक्‍सलियों के बीच के संबंधों को खंगालने में लगी थी।

बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनी एस्‍सार का किरंदुल, बस्‍तर के पास 80 लाख सालाना क्षमता वाला लौह अयस्‍क परिष्‍कार संयंत्र है। यहां से लौह अयस्‍क तरल रूप में 267 किलोमीटर लम्‍बी पाईप लाईन के द्वारा विशाखापट्टनम में स्थित कम्‍पनी के ही पैलेट संयंत्र में जाती है। विशाखापट्टनम में एस्‍सार की 8 मिलियन टन स्‍पात उत्‍पादन क्षमता की एक इकाई स्‍थापित है। बस्‍तर की कीमती लौह अयस्‍कों को कम्‍पनी कौड़ी के मोल लेकर विशाखापट्टनम ले जाती है, बस्‍तर से विशाखापट्टनम तक का यह सफर घने जंगलों और धुर नक्‍सल इलाके से होकर पूरा होता है। एस्‍सार द्वारा यहां द्वारा बिछाया गया पाईप लाईन दुनिया की दूसरे क्रम की सर्वाधिक लम्‍बी पाईप लाईन है इस पाईप लाईन को बिछाने से लेकर सुविधापूर्वक संचालन के लिए एस्‍सार को नक्‍सलियों को निरंतर पैसे देने पड़े हैं। पिछले वर्ष नक्‍सलियों के द्वारा बस्‍तर से लगे उडीसा के चित्रकोंडा इलाके में इस पाईप लाईन को विष्‍फोट से उडा दिया गया था, उस समय लोगों का कहना है कि इसे उडाने में नक्‍सलियों और किसी ट्रांसपोर्टर का हाथ है। पाईप लाईन के फूटने पर ट्रांसपोर्टरों की बन पड़ी थी और लौह अयस्‍क ट्रकों के द्वारा ढोया जाने लगा था। यद्धपि नक्‍सलियों के द्वारा समय समय पर लौह अयस्‍क की ढ़ुलाई करते ट्रकों को जलाया गया और ढुलाई बंद रखने को कहा गया किन्‍तु दो-चार दिनों के विराम के बाद पुन: ढुलाई चालू हो गई। अयस्‍कों की ज्‍यादातर ढुलाई ठेकेदार बी.के.लाला के ट्रकों के द्वारा ही किया गया और ज्‍यादा मात्रा में इसी के ट्रकों को नक्‍सलियों नें फूंका भी।

एस्‍सार को बस्‍तर से लौह अयस्‍क को पाईप लाईन के द्वारा विशाखापट्टनम ले जाने के लिए लगभग साढ़े चार लाख क्‍यूसेक पानी की आवश्‍यकता पड़ती है। यह पानी बस्‍तर के कोंख से निकाल कर समुद्र में व्‍यर्थ बहा दी जाती है, अयस्‍क के साथ ही बस्‍तर का पानी भी लूट लिया जाता है। यदि इस पाईप लाईन के बदले ट्रकों से अयस्‍क की ढुलाई होती तो ये पानी बचता और स्‍थानीय लोगों को कुछ अतिरिक्‍त रोजगार मिल पाता। किन्‍तु कम्‍पनी द्वारा परिवहन की लागत से बचने वाले बड़े मुनाफे में नक्सलियों को हिस्सेदारी दे दी जाती है और स्‍थानीय लोग ठगे रह जा रहे हैं। स्‍थानीय लोगों को रोजगार की मांग यहां के राजनैतिक नेता लोग करते रहे हैं किन्‍तु खानापूर्ती के अतिरिक्‍त स्‍थानीय लोगों को रोजगार कभी भी दी नहीं गई है सिर्फ मूर्ख बनाया गया है।

प्रकाशित समाचारों के अनुसार विगत 9 सितम्‍बर को पालनार इलाके के साप्‍ताहिक बाजार से एक ठेकेदार बी.के.लाला एवं लिंगाराम कोड़ोपी को पुलिस नें 15 लाख रूपये नगद के साथ गिरफ्तार किया उस समय गाड़ी में उपस्थित महिला सोनी सोढ़ी भाग गई। पुलिस अधीक्षक ने बताया कि ठेकेदार ने साफ तौर पर स्‍वीकार किया है कि प्रतिबंधित संगठन को पैसा देने के लिए यह रकम एस्‍सार कंपनी नें दिया है। पुलिस अधीक्षक अंकित गर्ग के द्वारा खुलासा किये जाने के बाद यह स्‍थानीय एवं राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय समाचारों की सुर्खियां बनके छा गई। लिंगाराम कोड़ोपी और सोनी सोढ़ी पंद्रह लाख लेकर दरभा कमेटी के नक्‍सली विनोद और रघु को सौंपने वाले थे। विनोद और रघु बाजार से लगभग तीन किमी दूर उनका इंतजार कर रहे थे। पुलिस की भनक लगते ही विनोद और रघु भाग गए।

गिरफ्तार लिंगाराम कोड़ोपी के समर्थन में बस्‍तर में जय जोहार नाम का संगठन चलाने वाले और बहुचर्चित गांधीवादी हिमाशु कुमार के साथ छत्‍तीसगढ़ शासन के प्रति हरेक सांस में आग उगलने वाले प्रशांत भूषण एवं नक्‍सलियों को छोड़कर संपूर्ण छत्‍तीसगढ़ को शोषक समझने वाली बुकर विजेता अरूंधती राय सामने आये हैं और रोज इनके कुछ ना कुछ बयान आ रहे हैं। तथाकथित रूप से रूपयों की डिलीवरी लेने वाला लिंगाराम कोडेपी कोई आंडू पांडू व्‍यक्ति नहीं है वह कई बड़े मीडिया ग्रुप को बस्‍तर की स्‍थानीय भाषा में सहयोग करने वाला अहम व्‍यक्ति रहा है। उसे पिछले वर्ष पुलिस नें मावोवादी होने का आरोप लगाते हुए लगभग 40 दिन तक गैरकानूनी रूप से अपने हिरासत में रखा था और उच्‍च न्‍यायालय के हस्‍तक्षेप के बाद उसे छोड़ा गया था। लिंगाराम दिल्‍ली के किसी प्रतिष्ठित पत्रकारिता अध्‍ययन शाला में पत्रकारिता के गुर सीख रहा है। लिंगाराम के गैरकानूनी हिरासत के संबंध में पिछले दिनों सभी बड़े मीडिया समूहों नें समाचार प्रकाशित किए थे जिसमें लिंगाराम अपने प्रिय स्‍वामी अग्निवेश के साथ पत्रकारों को संबोधित करते नजर आए थे। इस वाकये में आये सोनी सोढ़ी नाम की महिला बस्‍तर के किसी आश्रम शाला में प्राचार्य है और लिंगा की चाची है, उसके भी वीडियो और बयान समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए थे जिसमें उन्‍होंनें पुलिस पर ज्‍यादती के आरोप लगाए थे। 

समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के अनुसार बी.के.लाला नें यह दलील भी दी कि जब उसकी 18 लाख की गाडियों को नक्‍सलियों नें आग के हवाले कर दी तब नक्‍सलियों नें उससे फोन पर संपर्क किया। यह भी हो सकता है कि गाडि़यां जलाने के पूर्व उससे रकम वसूली के लिए फोन आये हों। पुलिस के मुताबिक लाला नें लगातार नक्‍सलियों से बातचीत की है, लगभग एक प्रकार से संपर्क निरंतर बनाए रखा है। एस्‍सार और नक्‍सलियों के बीच लायजनिंग का काम मुख्‍यतया बी.के.लाला नें ही किया है। एस्‍सार को बस्‍तर से लौह अयस्‍क लूटना था और नक्‍सलियों को इसके एवज में पैसे चाहिए थे, लाला को दलाली चाहिए थी और बस्‍तर के कुछ तथाकथित आदिवासियों को अपने ही बस्‍तरिहा भाईयों के प्रति गद्दारी करनी थी।

वर्तमान परिस्थितियों से यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि लंगोटी धारी आदिवासियों के हक से जल-जंगल-जमीन छीनकर एस्‍सार और टाटा जैसी बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनी अपना धन का भंडार निरंतर भर रही है। आदिवासियों के हक के लिये हथियार उठाने वाले तथाकथित नक्‍सली भी अब स्‍वयं पैसे के एवज में आदिवासियों के आबरू को बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनी से लुटवा रहे हैं। एक तरफ वे भोली जनता को बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनी और शोषक वर्ग के विरोध में भड़का कर हथियार उठाने को मजबूर कर रहे हैं और दूसरी तरफ शोषक वर्ग के कंधे में कंधा मिलाकर उनसे पैसा वसूल रहे हैं। बस्‍तर व देश के अन्‍य हिस्‍से में हो रहे शोषण, भ्रष्‍टाचार और कमजोर वर्ग के प्रति अत्‍याचार के विरूद्ध मुखर होने का ढ़ोंग रचने वाले इन लोगों नें नक्‍सलबाड़ी से उठे आन्‍दोलन के उद्देश्‍यों को भुला दिया है। अब यह संगठन पूर्णतया वसूली उगाही का संगठन बन कर रह गया है जो जनता के प्रति जुल्‍म कराने की छूट देने के एवज में जुल्‍म करने वालों से पैसा वसूलती है। जंगल में जनता मूर्ख बनकर इन्‍हें अपना आका मानती है और ये समय-समय पर आदिवासियों के पीठ में छूरा भोंकते रहते हैं। अपने मतलब के लिये पुलिस से लड़वाते हैं और पैसा वसूली हो जाने पर आदिवासियों को लंगोटी के हाल में छोड़कर पुलिस का दबाव का बहाना बनाते हुए उन्‍हें उनकी ही हाल पे छोड़ खसक जाते हैं। उगाही का यह पैसा जंगलों से शहरों के आरामगाहों तक पहुचता है और यह तथाकथित वाद एक मजाक के सिवा कुछ नहीं रह जाता।

ट्रांसपोर्टर लाला के खबर के साथ ही मुझे पिछले वर्ष की एक घटना याद आ रही है। किरंदुल के परिवहन व्‍यवसाय में रोजगार कर रहे लगभग पच्‍चीस-तीस लोगों से मेरा पिछले वर्ष सामना हुआ था। दुर्ग से बिलासपुर साउथ बिहार एक्‍सप्रेस के स्‍लीपर बोगी में टीटीई और बिहार के कुछ नौजवानों के बीच नोकझोंक हो रही थी। रायपुर से भाटापारा तक हो रहे इनके नोकझोंक को मैं दो बोगियों में आते जाते हुए सुनते रहा। टीटीई का कहना था कि दो बोगियो में एक जैसे नाम के लगभग तीस सीट बुक हैं, तुम लोगों नें कुछ ना कुछ तो फर्जी किया है मुझे सही आईडी बतलाओ किन्‍तु उनके पास कोई सही आईडी नहीं था। ड्राईविंग लायसेंस पर टीटीई को शक था क्‍योंकि लायसेंस पुराना था और फोटो एवं नाम धुंधले पड़ गए थे। बात बढ़ते देखकर उन्‍हीं में से एक लड़का सामने आया और अपने आप को एक प्रतिष्ठित टीवी मीडिया का पत्रकार बतलाते हुए टीटीई पर धौंस जमाने लगा। खैर मामला जैसे तैसे निबटा क्‍योंकि लायसेंस फर्जी थे यह स्‍पष्‍ट था जिसमें फोटो सहीं लगे थे उसका नाम कुछ और था टीवी पत्रकार दलील देता रहा कि उसका नाम सर्टिफिकेट में 'अ' है बोलचाल में 'ह' है आपने पूछा तो वह हड़बड़ा कर अपना नाम 'ह' बता रहा है। यह किस्‍सा बिल्‍हा तक चलते रहा और प्रथम दृष्‍टया दस्‍तावेजी साक्ष्‍यों के आधार पर टीटीई को उन्‍हें सफर करने की अनुमति देनी पड़ी।

हमने कुछ और जानकारी उन लड़कों से लेनी चाही तो पता चला वे लौह अयस्‍क की ट्रक में ड्राईवर क्‍लीनर है। किरंदुल से विशाखापट्टनम चलते हैं, ट्रक ही उनका घर है। नक्‍सल इलाकों में काम करने से डर नहीं लगता पूछने पर उनका कहना था कि वे हमें कुछ नहीं करते, ट्रक मालिक पैसा देता है इस कारण उसका ट्रक बिना बाधा के चलता है ... अभी मालिक ने पैसा नहीं दिया इसलिये उसकी ट्रकें जला दी गई है ... और हम लोग नया ट्रक आते या जली ट्रकों के बनते तक खाली हैं ... इसलिये कम्‍पनी नें हमें छुट्टी दे दिया है। टीवी पत्रकार से उसके संबंध में पूछने पर पहले वह बिहारी अंदाज में उडता रहा, पहले अपने आप को पत्रकार, फिर कैमरामैंन फिर असिस्‍टेंट फिर कैमरामैन का मोटरसाईकल चालक के रूप में अपने आप को स्‍वीकार किया, उसे अपनी औकात इसलिये बतलानी पड़ी कि हम बस्‍तर में काम कर रहे टीवी पत्रकारों के संबंध में उससे पूछने लगे और उसे लगने लगा कि अब उसकी पोल खुल जायेगी तो बतलाया कि वह कभी कभार मोटर सायकल चलाता है और टीवी वालों के लिए फोकस पकड़ता है, उनके लिये चाय गुटका लाता है। बात करते करते हमारा स्‍टेशन आ गया और हम बिलासपुर में उतर गए।

कभी इस घटना को किसी से जोड़ने का प्रयास नहीं किया हॉं एक बात जरूर बाहर निकल कर आई कि विशाखापट्ठनम के पोर्ट एरिया में हजारों टन अनक्‍लेम्‍ड पड़े लौह अयस्‍कों के खेल में इन ट्रांसपोर्टरों का बहुत बड़ा हाथ है। विशाखापट्ठनम के पोर्ट एरिया से लौह अयस्‍क विदेश निर्यात भी किये जाते हैं। ऐसे छोटे निर्यातक जिनके पास अयस्‍क निर्यात का लायसेंस है और वे नियमित रूप से खदानों से माल नहीं खरीद पाते। वे ऐसे माल की तलाश में रहते हैं जो लूप के सहार उन्‍हें मिल जाए। इधर उधर से फर्जी दस्‍तावेज तैयार कर वे इसे विदेशों में निर्यात कर सकें। हकीकत के नजदीक की संभावनाओं में ये माल इन्‍हें बस्‍तर के खदानों के आस-पास चोरी से संग्रहित किये गए एवं नक्‍सली उत्‍पात में बिखर गए एवं बाद में पोर्ट एरिया में लाए गए माल होते हैं। ऐसी भी स्थिति होती होगी जब नक्‍सलियों के द्वारा पचास-पचास ट्रकों को जला दिया जाता हो और इन्‍हें फिर से लोडिंग किया जाता है तो कम्‍पनी को माल कम मिलता है बीच में कुछ ट्रक मालों की अफरा तफरी भी हो जाती है। इस खेल में ट्रांसपोर्टर और छोटे निर्यातक बढि़या रकम बनाते हैं और बस्‍तर का अयस्‍क बड़े छोटे व्‍यवसायियों से ऐसे ही लुटता रहता है।

आज जब लाला की खबर से रोज समाचार रंग रहे हैं तो याद आ रहे हैं वे ड्राइवर और क्‍लीनर। उनकी स्‍वीकारोक्ति थी कि ट्रक चलाने के लिये मालिक नोट देता है और उसके ट्रकों को कोई भी नहीं रोक सकता, नोट नहीं देने के कारण या कोई गलतफहमी के कारण ही मालिक की ट्रकें फूंकी गई। पुलिस के अनुसार लाला नें यह स्‍वीकार किया है कि वह 15 लाख रूपये मावोवादियों को देने जा रहा था किन्‍तु उसके साथ गिरफ्तार लिंगाराम इसे स्‍वीकार नहीं कर रहा है। हैं। लिंगाराम के हितचिंतकों का कहना है कि लिंगा को बेवजह फंसाया गया है। जिस जगह में पुलिस उन दोनों को गिरफ्तार करना बता रही है वहां से उन्‍हें नहीं पकड़ा गया है बल्कि उन्‍हें अलग-अलग स्‍थानों से पकड़ कर झूठी कहानी गढ़ी जा रही है। अब हकीकत क्‍या है ये अंकित गर्ग जी जाने एवं मानवाधिकारवादी जाने।

लिंगा और सोनी वास्‍तविक अपराधी हैं या नहीं यह तो न्‍यायालय तय करेगी किन्‍तु इस वाकये से ये बात तो खुल कर समने आ गई है कि एस्‍सार जैसी कम्‍पनियां एक तरफ शासन के साथ मिलकर माओवाद के खात्‍में की वकालत करती है दूसरी तरफ माओवाद को बढ़ावा देनें के लिए उन्‍हें सहायता करती है। बस्‍तर के जानकारों का कहना है कि बस्‍तर में काम करने वालों की यह मजबूरी है चाहे वे उद्योगपति हों, व्‍यवसायी हो, सरकारी अधिकारी हों या नेता हो बस्‍तर में सांस लेने का टैक्‍स उन्‍हें देना पड़ता है। बस्‍तर की अकूत सम्‍पत्ति को लूटने के एवज में लेवी उन्‍हें देना पड़ता है जो बस्‍तर के आदिवासियों के हक के झंडाबरदार हैं। पिछले दिनों पकड़ाए एक नक्‍सल नेता की माने तो मावोवादियों का सालाना वसूली लक्ष्‍य छत्‍तीसगढ़, झारखण्‍ड बिहार के लिए 5000 करोड रूपये है। यदि यही राशि आदिवासियों को सीधे मिल जाए तो क्‍उन्‍हें चिकित्‍सा, शिक्षा व रोजगार के लिए खून की आंसू बहाना नहीं पड़ेगा। इस पैसे में से आधा मावोवादियों के एशो आराम और कैम्‍पेनिंग में और आधा दहशत फैलाने के एवज में खर्च दिया जाता है। अब बताये आदिवासियों का सबसे बड़ा शोषक कौन हुआ, नक्‍सल के नाम पर आदिवासियों का शोषण करते इन लोगों को आप क्‍या कहेंगें ... क्‍या यही है आदिवासियों के असल झंडाबरदार ....


संजीव तिवारी


लिंगा के संबंध में जनज्‍वार में हिमाशु कुमार की रिपोर्ट
जनतंत्र में लिंगा
मोहल्‍ला लाईव में लिंगा
आईबीएन में लिंगा
तहलका में सोनी सोढ़ी और लिंगा

विश्‍व रंजन ... विश्‍वरंजन

(चित्र रविवार डाट काम से साभार)
कल मेल से प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के एक आयोजन की जानकारी, प्रेस विज्ञप्ति के माध्‍यम से प्राप्‍त हुई। इस पर कुछ विचार आ ही रहे थे कि मित्रों से पता चला कि प्रदेश कांग्रेस के अध्‍यक्ष के काफिले पर नक्‍सल हमला हुआ है और एक गाड़ी विष्‍फोट से उड़ा दी गई है। दो तीन फोन खटखटाए, कांग्रेस से जुड़े मित्र और रिश्‍तेदारों को सही सलामत पाकर पुन: काम में लग गए। किन्‍तु विचार और कार्य के साथ तालमेल नहीं बैठ रहा था, .... अपने रिश्‍तेदार या मित्र तो नहीं मरे यही सोंचकर हम प्रदेश की इस बड़ी समस्‍या से सदैव मुह मोड़ लेते हैं।

हमारे या आपके मुह मोड़ने या गाल बजाने से यह समस्‍या हल नहीं हो सकती। बारूद से दहलते बस्‍तर से ही एक तरफ समाचार आते हैं कि फलां अधिकारी के यहां एन्‍टीकरप्‍शन ब्‍यूरो का छापा पड़ा - अकूत सम्‍पत्ति बरामद। तो दूसरी तरफ समाचार आते हैं कि आदिवासी अपनी लंगोट के लिए भी तरस रहे हैं। यह आर्थिक असमानता सिद्ध करती है कि आदिवासियों के हक के पैसे साहबों के घर में जमा हो रहे हैं और आदिवासी छीने जा चुके लंगोट के कारण अपना गुप्‍तांग हाथों में छुपाकर घने जंगल में अंदर की ओर भाग रहे हैं। वे स्‍वयं भाग रहे हैं या उन्‍हें षड़यंत्रपूर्वक भगाया जा रहा है इसकी पड़ताल भी होनी चाहिए। जंगल में भागे कुछ लंगोट धारी, नक्‍सली वर्दी में बंदूक के साथ वापस लौट रहे हैं। किन्‍तु वे बस्‍तर के आदिवासियों का हक छीनकर अरब-खरबपती बनते सरकारी नुमाइंदों, शोषक साहबों पर बंदूक तानने के बजाए पुलिस और निरीह जनता की प्‍यासी हलक पर उपनी गोलियां उतार रहे हैं।

बस्‍तर में हुए कल के हमले और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की विज्ञप्ति के बीच छत्‍तीसगढ़ के डीजीपी विश्‍वरंजन भी याद आ रहे थे। क्‍योंकि कल दोपहर को मोबाईल गूगल रीडर से जनपक्ष में प्रकाशित कविता पढ़ा था, जिसमें लिखा था कि ''यह कविता छत्तीसगढ़ के जाने-माने पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन को राज्य सरकार द्वारा पद से हटाये जाने के बाद लेखकीय प्रतिबद्धता से जुड़े साहित्यकारों के बीच एक गंभीर बहस पर आधारित है ‘एक तानाशाह का पंचनामा’ जिसे विश्वरंजन के तमाम लेखों सहित पंकज चतुर्वेदी का खत और जयप्रकाश मानस की बौद्धिक जद्दोजहद को पढने के बाद पूरी बहस को एक सार्थक निष्कर्ष तक ले जाने की कोशिश की गयी है.'' कविता पोस्‍ट पर अभी तक कोई कमेंट नहीं हैं, निष्‍कर्ष हैं ‘एक तानाशाह का पंचनामा’।
      
इस कविता में जिसे तथाकथित तानाशाह के ओहदों से नवाजा गया है उसकी गलबंइहा लेनें इस माह के 23-24 जुलाई को साहित्‍य जगत के ही कुछ विशेष नामधारी जिनमें प्रो. कृष्ण दत्त पालीवाल, श्री प्रफूल्ल कोलख्यान, श्री नरेन्द्र श्रीवास्तव, मधुरेश, श्रीभगवान सिंह, श्री दीपक पाचपोर, जयप्रकाश मानस, शंभुलाल शर्मा वसंत, जया केतकी राज्य के 200 से अधिक साहित्यकार, कवि, शिक्षाविद, डॉ. सुशील त्रिवेदी, सर्वश्री गोपाल राय, रमेश कुंतल मेघ, नंदकिशोर आचार्य, प्रो. अजय तिवारी, जानकी प्रसाद शर्मा, कुमार पंकज, रेवती रमण, सुरेन्द्र स्निग्ध, शंभु गुप्त, विजय शर्मा, अजय वर्मा, डॉ. रोहिताश्व, श्रीप्रकाश मिश्र, ज्योतिष जोशी, डॉ. शशिकला राय, प्रो. चन्द्रलेखा डिसूजा, श्रीभगवान सिंह, भारत भारद्वाज, प्रभात त्रिपाठी, अश्वघोष, पंकज पराशर, गंगा प्रसाद बरसैंया, कालू लाल कुलमी एवं राज्य के आलोचकगण प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान के कार्यक्रम में रायपुर पधार रहे हैं।

विश्‍वरंजन अपने समूचे कार्यकाल में अन्‍य राज्‍य पुलिस प्रमुखों से ज्‍यादा चर्चा के केन्‍द्र में रहे। विश्‍वरंजन के छत्‍तीसगढ़ में पदभार ग्रहण करने  के बाद उनके साहित्यिक क्रियाकलापों में लगातार जुड़े रहने पर देश व प्रदेश से विरोध 
के स्‍वर लगातार उठते रहे, किन्‍तु तमाम विरोधों के बावजूद मुख्‍यमंत्री जी को विश्‍वरंजन प्रिय रहे। डॉ.रमन को यह भरोसा हो चला था कि नक्‍सल मोर्चे पर दोतरफा वार विश्‍वरंजन ही कर सकते हैं। इसीलिये वे पुलिस प्रमुख के पद पर लगातार तब तक बने रहे जब तक भाजपा की अंर्तशक्ति संघ नें नहीं कहा। डॉ.रमन सरकार के विश्‍वरंजन के साहित्यिक क्रियाकलापों पर विरोध के बावजूद रोक लगाने के बजाए बढ़ावा देना इस बात की साक्षी थी कि सरकार स्‍वयं यह चाहती है कि नक्‍सलवाद से बंदूक के साथ ही वैचारिक ढ़ग से भी निबटा जाए। क्‍योंकि धुर जंगल में मारकाट कर रहे नक्‍सलियों के पीछे शहर में बैठे तथाकथित वैचारिक लोगों का अज्ञात समूह मानसिक रूप से उन्‍हें बल देता है। जिन्‍हें गोली से नहीं विचारों से शिकश्‍त दिया जा सकता है। 

राज्‍य के प्रश्रय में चल रहे सलवा जुड़ुम आन्‍दोलन के मुख्‍य सारथी के रूप में विश्‍वरंजन समय समय पर मीडिया व बुद्धिजीवियों के सम्‍मुख उपस्थित होते रहे हैं। वे अपनी तर्कपूर्ण उत्‍तरों से सदैव इस तथाकथित स्‍वस्‍फूर्त आन्‍दोलन का पक्ष लेते रहे हैं। मानवाधिकार वादियों के छत्‍तीसगढ़ में रूदाली मचाये जाने पर भी उन्‍होंनें सदैव सामने आकर बयान दिया और उनका प्रमुखता से प्रतिरोध भी किया है। छत्‍तीसगढ़ में हो रहे नक्‍सल नरसंहार व संविधान की खुले आम अवहेलना पर वे न केवल एक पुलिस मुखिया के रूप में डटे रहे बल्कि वैचारिक क्रांति लाने के उद्देश्‍य से वैचारिक प्रहार भी करते रहे। नरसंहार व नक्‍सलियों के अमानवीय कृत्‍यों को जनता तक पहुचाने हेतु वे प्रयासरत रहे एवं नरसंहार व बर्बरता के साक्ष्‍य के रूप में चित्र प्रदर्शनियॉं भी जगह-जगह लगवाते रहे ताकि जनता पुलिस व नक्‍सलियों के कृत्‍यों को समझ सके और पुलिस को वैचारिक रूप से जनता का सहयोग मिले। प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान की स्‍थापना व विश्‍वरंजन के पद पर रहते हुए संस्‍थान के संपादित विविध आयोजनों व संचालन का विरोध भी गाहे बगाहे होते रहा है। प्रदेश के साहित्‍यकार विश्‍वरंजन के इस रथ में कुछ शामिल हुए और कुछ स्‍पष्‍ट रूप से विरोध में खड़े रहे तो कुछ अपनी तटस्‍थता में चुप रहे। 

साहित्‍यकारों-विचारकों के आपसी गुटबाजी से परे सोंचें तो प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान नें प्रदेश को साहित्यिक क्षितिज पर एक पहचान दी है। संस्‍थान नें लेखक बिरादरी को व नये कलमकारों को अलग-अलग विधा में पारंगत करने के लिए कार्यशाला का आयोजन किया है और साहित्यिक विषयों पर गंभीर विमर्श करवायें हैं। प्रमोद वर्मा की समग्र रचनायें ग्रंथावली के रूप में प्रकाशित कर संस्‍थान नें बहुत सुन्‍दर कार्य किया। संस्‍थान नें अनेक अन्‍य साहित्‍यकारों की कृतियों को भी प्रकाशित कराने में सहयोग दिया है जिससे साहित्‍यकारों में एक आशा की किरण फूटी है। प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान द्वारा प्रकाशित पत्रिका पाण्‍डुलिपि हिन्‍दी साहित्‍य जगत में एक महत्‍वपूर्ण पत्रिका के रूप में उभरी है।

विश्‍वरंजन के छत्‍तीसगढ़ के साहित्यिक क्षितिज में 
धमाकेदार अवतरण एवं उल्‍लेखनीय अवदान को देखते हुए आशावादियों का मानना था कि इनके मौजूदा कार्यकाल में छत्‍तीसगढ़ शासन इन्‍हें सेवावृद्धि भी देगी और विश्‍वरंजन का साथ दो-तीन वर्ष और मिल पायेगा। बल्कि कुछ साहित्‍यकारों का मानना था कि वैचारिक व्‍यूह जल्‍द ही ध्‍वस्‍त हो जावेंगें। यद्धपि नक्‍सल उन्‍मूलन के लिए सरकार के.पी.एस.गिल जैसे धुरंधर को भी बतौर सलाहकार लेकर आई पर सरकार को कोई फायदा नहीं हुआ। विश्‍वरंजन को स्‍वयं मुख्‍यमंत्री आईबी से लेकर आये तब धमाकेदार प्रवेश नें सबको चौंकाया। इनकी कार्यशैली व चुस्‍ती की जितनी प्रशंसा हुई उतनी ही गजलकार के नाती के रूप में इन्‍हें प्रतिष्ठित करने के प्रोपोगंडे का विरोध भी हुआ। उनके व्‍यक्तित्‍व में एक कवि व चित्रकार के रूप को अनावश्‍यक उभार देने के कार्य से कइयों का मन भी आहत हुआ। हमने भी एक लम्‍बी कविता दे मारी थी। हालांकि इसके बाद जयप्रकाश मानस जी नें इसे कविताई कहा और हमें सुन्‍दर पदों से विभूषित भी किया। मेरे जैसे विरोध के स्‍वरों पर विश्‍वरंजन नें कई-कई बार कहा कि वे इन छोटी-मोटी बातों में अपना दिमाग खराब नहीं करते और अपना समय भी नहीं गंवाते। 

इन दिनों डीजीपी एवं प्रदेश के गृह मंत्री के बीच वैचारिक मदभेद की खबरें भी लगातार समाचार पत्रों में आती रही पर लगता था कि विश्‍वरंजन इन सब बातों से परे शिव बने हुए हैं। अचानक उन्‍हें हटाया जाना यद्यपि अप्रत्‍याशित रहा ...  किन्‍तु विश्‍वरंजन ... विश्‍वरंजन. बने रहे.



संजीव तिवारी

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छत्‍तीसगढ़ में शिवनाथ नदी के किनारे बसे एक छोटे से गॉंव में जन्‍म, उच्‍चतर माध्‍यमिक स्‍तर तक की पढ़ाई गॉंव से सात किलोमीटर दूर सिमगा में, बेमेतरा से 1986 में वाणिज्‍य स्‍नातक एवं दुर्ग से 1988 में वाणिज्‍य स्‍नातकोत्‍तर. प्रबंधन में डिप्‍लोमा एवं विधि स्‍नातक, हिन्‍दी में स्‍नातकोत्‍तर की पढ़ाई स्‍टील सिटी में निजी क्षेत्रों में रोजगार करते हुए अनायास हुई. अब पेशे से विधिक सलाहकार हूँ. व्‍यक्तित्‍व से ठेठ छत्‍तीसगढि़या, देश-प्रदेश की वर्तमान व्‍यवस्‍था से लगभग असंतुष्‍ट, मंच और माईक से भकुवा जाने में माहिर.

गॉंव में नदी, खेत, बगीचा, गुड़ी और खलिहानों में धमाचौकड़ी के साथ ही खदर के कुरिया में, कंडिल की रौशनी में सारिका और हंस से मेरी मॉं नें साक्षात्‍कार कराया. तब से लेखन के क्षेत्र में जो साहित्‍य के रूप में प्रतिष्ठित है उन हर्फों को पढ़नें में रूचि है. पढ़ते पढ़ते कुछ लिखना भी हो जाता है, गूगल बाबा की किरपा से 2007 से तथाकथित रूप से ब्‍लॉगर हैं जिसे साधने का प्रयास है यह ...