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एक अनौपचारिक समालोचन : व्हॉट्स-एपिया रोमांस

शिवना प्रकाशन द्वारा हाल में प्रकाशित नये जमाने की कहानी संग्रह 'व्हॉट्स-एपिया रोमांस' को 'रोमांस कभी खत्म नहीं हो सकता है' से '.. रंगरेलियां मनाते पकड़े गए अपने बाप की ..' तक, एक ही सिटिंग में पढ़ गया। कुछ सिर से ऊपर भी गुजरी, तो फिर-फिर पढ़ा, और जितनी बार पढ़ा, नए अर्थ खुलते गए। वैसे संग्रह में के.रवींद्र के चित्र, कहानियों को समझने की बीच लगने वाले समय में, खजाने की खोज वाले नक्शे से प्रतीत होते हैं। जिसे निहारते हुए अभिव्‍यक्ति को सहजता से अंदर तक अत्‍मसाध किया जा सके। संग्रह के लेखक समीर यादव, किताब में खुद कहते हैं 'इसमें एक दूसरे से अभिव्यक्त होने के लिए जो सहारे हैं न, वही इसके सबसे रोमांचक, बेहद खूबसूरत हिस्सा भी हैं।' इन कहानियों में अभिव्यक्त होती, बगरती, खूबसूरती, समीर की परिकल्पना और उसे शब्दों में ढालने की संवेदनशील 'उदीम' सचमुच कमाल है।

वे एक जगह लिखते हैं कि, व्‍हाट्स एप में अनेक फीचर्स हैं जिसको जानने वाले रोमांस का फीचर बना लेते हैं। मतलब यह कि, तकनीक रूप से सक्षम व्यक्ति व्‍हाट्स एपिया रोमांस को अपने फेवर में करने का माद्दा रखते हैं। जिनको व्‍हाट्स एप के तकनीकी फीचर की ज्‍यादा जानकारी नहीं है उन्हें तो यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। यह उन्‍हें व्‍हाट्स एप तकनीकी में भी माहिर बना देगी और रोमांस में भी। पूरे किताब में ही, शी सहित मनीषा, मनोज, वत्‍सला, सानिका, महीप, प्रिया, शकुन, गोकुल और समर जैसे पात्र एक दूसरे से चैट करते हुए प्रेम को अपनी-अपनी समझ और अनुभूति से अभिव्यक्त करते हैं। इस कथोपकथन में एक चमत्कृत कर देने वाली कहानी उभरती है जो आधुनिक प्रेम कहानियों का प्रतिनिधित्‍व करती है। इसके साथ ही समीर द्वारा व्यग्रता के क्षणों में लिखे गए व्यवसाय से जुड़े नोट्स व अन्य लघुकथाएं भी इसी तारतम्‍य में पठनीय है।

यह सच है कि समीर में लिखने या लिखे हुए को पढ़कर समझने की तमीज, उन्हें अपने आदरणीय बाबूजी सुकवि बुधराम यादव जी से विरासत में मिली है। सुकवि बुधराम यादव जी छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार हैं, और लोकतत्व से गहरे से जुड़े बेहद संवेदनशील कवि है। उनसे विरासत में प्राप्‍त मेधा ही समीर को लेखन में गंभीर बनाती है। इसीलिए तो पल्लवी कहती है 'समीर प्रेम कहानियां लिखते हुए सबसे सहज होते हैं।' यह सहजता, समीर नें अपने विरासत और पढ़ाकूपन की जुगलबंदी से प्राप्त किया है।

स्‍मार्ट फोन में चेटियाते हुए, रोमांस की आग जब सुलगती है तब क्या होता है आप सब जानते हैं, किंतु इसे सभी अभिव्यक्त नहीं कर पाते। इसे समीर अभिव्यक्त करते हैं, कुछ इस तरह 'हॉं, कुछ हो रहा था कल रात, मगर वह नहीं जो तुम सोच रही। इस मुहब्बत में दोनों तरफ बराबर की लगी है। खयाल का, डर का, भरोसे का, तो छल का भी.. और इनमें फर्क बहुत बारीक है।' मुहब्बत के बीच जो छल है वह 'इसमें मैं कहां' और दूसरी कहानियों में प्रतिध्वनी होती है। ऐसे ही धड़कनों सी कम शब्दों में पूरी कहानी बयां कर देने की कला समीर के इस किताब में हर जगह नजर आती है। उसे गंभीरता से समझने की आवश्‍यकता है किंतु वे स्‍वयं कहते हैं कि, समझता वही है 'लिखो जिसे पढ़ें सब, समझे बस वो'।

इस संग्रह की कहानियॉं और उसके पात्र कहॉं से और कैसे हर्फों में उतरी इसके संबंध में वे 'कुछ कहूं..' में लिखते हैं कि ब्‍हाट्स एप के चलन के साथ ही कई किरदार उनके जेहन में विचरने लगे थे। यह आधुनिक समीक्षा शास्त्र के उस अहम तत्‍व की पूर्ति करता है जिसे लोचक 'भोगा हुआ यथार्थ कहते हैं। संग्रह की कहानियों का प्‍लाट, समीर के आस-पास की दुनियां से ही लिए गए है जिससे वो वाकिफ हैं या जिसे उन्‍होंनें महसूस किया है। इस तरह से इसमें संग्रहित कहांनियां, कथाकार के भोगे गए यथार्थ का चित्रण है।

घिसे-पिटे आलोचना के गूढ शब्दों में एक शब्‍द और है 'प्रांजल भाषा', जो रचना का मूल तत्‍व है, यद्धपि व्‍हाट्स-एपियाई कहानियों में इसे खोजना बेमानी है फिर भी भाषा का संस्कार समीर नें अपने पिता से पाया है। भाषा की प्रांजलता और काल-परिस्थितियों के चित्रण में लेखक नें अपनी क्षमता, इसी किताब में कुछ इस तरह सिद्ध किया है-
'.. उफ यह उसकी मंजिल तो नहीं..। जीने पर संभाल कर रखी जा रही सेंडिल की हर एक टिक-टिक राघव के उन्माद को जगा रही थी, उसे नशा सा हो रहा था है। कामना को पहली बार देखते ही जो उसने सोचा था, उसे आज तमील करेगा। टावर का दरवाजा धूप और बारिश से टेढ़ा होकर चौखट पर मिसफिट हो गया था, उस पर टावर की छोटी सी जगह में पुराने लेटर-बाक्स और डाक-बैग छिथरे पढे थे। सांस संभालती कामना की छत पर जाने की अनचाही सी कोशिश, अचानक राघव के कांखों से आ रहे डियो की खुशबू नथुनों में समाने के साथ समाप्त हो गई। उसके गर्दन के मुलायम रेशे बाजुओं के कसाव से सिंदूरी होने लगे। फिर थोड़ी देर सिगरेट की पहचानी सी गंध, थोड़ा ऊपर बालों की पहचानी-सी खुशबू, थोड़ा नीचे गरम होते पसीने की गंध, इन ऊपर-नीचे के पल-पल कम होते दायरे नें उसके हल्के प्रतिरोधों को पूरी तरह खत्म कर एक खास आदिम अहसास से सराबोर कर दिया।' इसी क्रम में आगे 'अधखुले दरवाजे से बाहर की हवा और भीतर से राघव के अनियंत्रित रक्तप्रवाह की जंग का अंत हुआ तो वहां बस कामना की नाभि कस्तूरी की गंध रह गई थी।'
इन छोटी-छोटी कहानियों का अंत भी समीर ने बहुत सलीके से लिखा है, उसी तरह जिस तरह कथादेश, हंस और वागार्थ जैसे प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाले, नई कहानी के कथाकार लिखते हैं। जो कहानी को और उसमें निहित मार्मिकता को, देर तक महसूस करने को विवश करते हैं। 'आज मिल न..' का अंत देखें 'प्रिया एक बार फिर मैसेज का जवाब दिए बिना गोकुल को डबडबाई आंखों से ऑफलाइन होते देखती है।' सही है, इस संचार क्रांति के समय में प्रेमचंदी कहानियों के अंत की परम्‍परा को तो सम्‍हाला नहीं जा सकता।

इन कहानियों में शब्‍द समुच्‍चय और कथोपकथन के प्रयोग में समीर की परिकल्‍पना और शब्‍द क्षमता स्‍पष्‍ट नजर आती है। पूरे संग्रह में सहज-सरल भाषा में वे गहरी व प्रभावी बात गूंथते है। जैसे 'उसके कमेंट पर अपनी तकदीर तय करता हूं', 'आखिर वह उसके कॉन्टेक्ट लिस्ट में सेव है', और 'पहले कांटेक्ट लिस्ट में जगह तो बना लूं' या फिर 'पहले व्‍हाट्सएप फ्रैंड तो बन जाऊं'। इसके साथ ही 'इश्क में यकीन किसी शब्द का मोहताज नहीं होता', और 'तुम मेरे खिलाफ हवा में सांस लेने लगी हो', या फिर 'तुम मौजूद तो होते हो, मगर तुम साथ नहीं होते हो'। इसी तरह के कई उल्‍लेखनीय वाक्‍यों से कहानियॉं आगे बढ़ती हैं। इन कहानियों की भाषा नई है, यकीनन भविष्य में यही भाषा हिंदी कहानियों की मूल भाषा बनेगी, क्योंकि समय के साथ ही भाषा भी संस्कारित होती है जिसमें डाट्स, इस्माइली, इमोजी और अंग्रेजी के शब्‍द बहुत तेजी से समा रही है।

इन कहानियों में लोकोक्तियां और मुहावरों का प्रयोग भी समीर ने बखूबी से किया है। चौकिये नहीं, आप यह कह सकते हैं कि मुझे तो नजर नहीं आई। तो साहबान, नए समय की इन कहानियों में नए समय की लोकोक्तियां और मुहावरे ही तो प्रासंगिक होंगे ना? डॉ.परदेशीराम वर्मा की कहानी 'संतरा बाई की शर्त' और कैलाश बनवासी की कहानी 'बाजार में रामधन' में प्रयुक्‍त पारंपरिक लोकोक्तियां इन कहानियों में मत ढूंढिए। इस किताब में वही आधुनिक लोकोक्तियां और मुहावरे ही नजर आयेंगें, जो व्‍हाट्स एप, फेसबुक और ट्विटर में इस्तेमाल की जा रही है। इन कहानियों को पढ़ते हुए, मुझे ऐसा विश्वास है कि, आधुनिक परिवेश में, समय के साथ-साथ आगे बढ़ती हुई हिंदी कहानी इसी रुप में, सामने आएगी। यह भी कि, समीर नई कहानी के इस युग के पहले कहानीकार हैं जो समय की रिदम को पकड़ पा रहे हैं। आधुनिक कथाकारों में कथाकार पंकज सुबीर इन धड़कनों को बखूबी समझते हैं, शायद इसीलिए उन्होंने समीर की इन कहानियों को समझा और अपने प्रकाशन से इसे प्रकाशित करवाया।

किताब के संबंध में यह बेहद अनौपचारिक समालोचन, इस नए जमाने के माध्यम 'गूगल वॉइस टाइपिंग' के फीचर को इस्तेमाल करके, स्मार्टफोन से बोलकर लिखा गया है। इस हिसाब से यह पहली आलोचना मानी जाए और हिंदी आलोचना के इतिहास में दर्ज की जाए।
-संजीव तिवारी
'व्‍हाट्स-एपिया रोमांस' आनलाईन आर्डर देनें के संबंध में यहॉं जानकारी है।
'व्‍हाट्स-एपिया रोमांस' के लेखक समीर यादव से फेसबुक में आप यहॉं मिल सकते हैं।

ढ़ोलकल: बस्तर का रहस्य


मनुष्य सदैव रहस्य की खोज में रहता है, उसकी उत्सुकता रहस्यों को निरंतर उद्घाटित करने की रहती है. रहस्य की परतें, परत दर परत जब खुलती है तो सीधे सपाट घटनाओं में भी रोचकता बढ़ती जाती है. पौराणिक आख्यानों में नागों के संबंध में भी ऐसे ही रहस्यमय घटनाओं का उल्लेख आता है. नाग लोक, वासुकी, तक्षक, शेष नाग, इच्छाधारी नाग नागिन जैसे रहस्यमयी नागो की कथायें हमें रूचिकर लगती है. राजीव रंजन प्रसाद द्वारा रचित एवं पिछले माह प्रकाशित उपन्यास ‘ढ़ोलकल‘ हमारी इसी रूचि को बढ़ाती है.

‘ढ़ोलकल‘ बस्तर के नाग शासकों पर केन्द्रित उपन्यास है, बस्तर में नाग शासकों का एक वैभवशाली अतीत रहा है. बस्तर में यत्र तत्र बिखरे पुरावशेष आज भी समृद्ध नागों के अस्तित्व को सिद्ध करते हैं. जिसके बावजूद बस्तर के नागों को लगभग बिसरा दिया गया है. ‘ढ़ोलकल‘में बस्तर के नाग शासकों के इसी विस्मृत काल का चित्रण करते हुए लेखक नें पौराणिक व ऐतिहासिक घटनाओं को अपने चितपरिचित कथात्मक शैली में पिरोया है. इस उपन्यास में नागो से जुड़े मिथकों तथा ऐतिहासिक तथ्यों का सुन्दर समन्वय है. राजीव रंजन प्रसाद जी नें इस उपन्यास में यथार्थ और कल्पना का एक रहस्यमय लोक तैयार किया हैं. उपन्यास के शब्द दर शब्द और पृष्ट दर पृष्ट नागों की जीवन शैली एवं उनके सांस्कृतिक-राजनैतिक इतिहास को राजीव नें ऐसा बिखेरा है कि एक बार पढ़ना आरंभ करने के बाद आप उसे अंत तक पढ़े बिना नहीं रह सकते.

‘ढ़ोलकल‘ उपन्यास की मूल कथा के अनुसार वारंगल से अपने राज्य विस्तार के हेतु से बस्तर की ओर बढ़ते चालुक्य वंशी राजा अन्नमदेव, नाग शासक हरिश्चन्द्र देव के चक्रकोट किले पर आक्रमण करता है. वृद्ध नाग शासक पिता के युद्ध में आहत होने के कारण नाग राज कुमारी चमेली बाबी अन्नमदेव से युद्ध करती है. अन्नमदेव उसकी वीरता एवं सौंदर्य से आकर्षित होता है किन्तु वीरांगना चमेली बाबी प्रणय निवेदन व पराजय स्वीकार करने के बजाए आत्मदाह कर लेती है. इसी घटना को आधार लेते हुए लेखक नें नागों के इस गौरव गाथा को विस्तारित किया है. पौराणिक दंत कथाओं, आख्यानों, मिथकों एवं इतिहास को आधार बनाते हुए नागों से संबंधित सभी संदर्भों को लेखक नें इस उपन्यास में स्थान दिया है. जिसमें कश्यप ऋषि की पत्नी विनीता व कद्रु से आरंभ नाग वंश, रामायण कालीन व महाभारत कालीन नागों का उल्लेख एवं ऐतिहासिक नागवंश के प्रत्येक महत्वपूर्ण घटनाओं व पात्रों को समाहित किया है. उपन्यास में नागों के संबंध में संदर्भ का उल्लेख एवं घटनाओं का कथात्मक विस्तार लेखक के गहन शोध को दर्शाता है. उपन्यास में संदर्भों एवं घटनाओं में लयात्मकता है, कथा का प्रवाह अद्भुत रोचकता के साथ अविरल है.

अजेय बस्तर की राज कुमारी चमेली बाबी को सलाम सहित, राजीव रंजन प्रसाद जी को मै बस्तर के नाग शासकों की गौरव गाथा के अभूतपूर्व सृजन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद देता हूं.

संजीव तिवारी

धूप की नदी: कील कॉंटे और कमन्द

वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार, कवि, पत्रकार सतीश जायसवाल जी का हालिया प्रकाशित यात्रा संस्मरण ‘कील कॉंटे कमन्द’ की चर्चा चारो ओर बिखरी हुई है। मैं बहुत दिनों से इस जुगत में था कि अगली बिलासपुर यात्रा में श्री पुस्तक माल से इसकी एक प्रति खरीदूं किन्तु उच्च न्यायालय के शहर से पहले स्थापित हो जाने के कारण, प्रत्येक दौरे में शहर जाना हो ही नहीं पा रहा था और किताब पढ़ने की छटपटाहट बढ़ते जा रही थी। इसी बीच कथा के लिए दिए जाने वाले प्रसिद्ध वनवाली कथा सम्मान से भी सतीश जायसवाल जी नवाजे गए। दो-दो बधाईयॉं ड्यू थी, और हम सोंच रहे थे कि अबकी बार बधाई वर्चुवल नहीं देंगें, उन्हें भिलाई बुलाते हैं और भिलाई साहित्य बिरादरी के साथ उन्हें बधाई देते हैं। जब वे बख्शी सृजन पीठ के अध्यक्ष थे तो भिलाई उनका निवास था इस कारण उनका लगाव भिलाई से आज तक बना हुआ है। शायद इसी जुड़ाव के कारण उन्होंनें हमारा अनुरोध स्वीकार किया। वो आए और भिलाई साहित्य बिरादरी के साथ एक सुन्दर आत्मीय मिलन का कार्यक्रम हुआ। इस कार्यक्रम की चर्चा फिर कभी, इस कार्यक्रम से ‘कील कॉंटे कमन्द’ में आवरण चित्रांकन करने वाली डॉ.सुनीता वर्मा जल्दी चली गयीं। प्रकाशक नें उनके लिए ‘कील कॉंटे कमन्द’ की एक प्रति सतीश जायसवाल जी के माध्यम से भेजा था, वह प्रति तब बतौर हरकारा मेरे माध्यम से भेजा जाना तय हुआ। किताब उन तक पहुचाने में विलंब हो रहा था और पन्ने फड़फड़ाते हुए आमंत्रित कर रहे थे कि पढ़ो मुझे।


स्कूल के दिनों में स्कूल खुलने के तत्काल बाद और नई पुस्तक खरीद कर जिल्द लगाने के पहले, नई किताबों से उठते महक को महसूस करते, हिन्दी विशिष्ठ में लम्बे और अटपटे से लगते नाम के लेखक की रचना ‘नीलम का सागर पन्ने का द्वीप’ को हमने तीस साल पहले पढ़ा था। बाद में हिन्दी के अध्यापक नें बताया था कि यह यात्रा संस्मरण है। जीवंत यात्रा संस्मरणों से यही हमारी पहली मुलाकात थी, बाद के बरसों में वाणिज्य लेकर पढ़ाई करने के बावजूद मैं हीरानंद सच्चिदानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ को बूझने का प्रयास उनकी कृतियों में करते रहा। पत्र-पत्रिकाओं में अन्यान्य विधाओं के साथ कुछेक यात्रा संस्मरण भी पढ़े, किन्तु अज्ञेय का वह जीवंत संस्मरण आज तक याद रहा। और यह कहा जा सकता है कि यात्रा संस्मरणों के प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ाने में वह एक कारक रहा। 

आदिवासी अंचल का यात्रा संस्मरण हाथ में था और जब हमने उसे खोला तो हमारी आंखें इस लाईन पर जम गई ‘... आखिरकार, यह एक रचनाकार का संस्मरण है। इसमें रचनाकार की अपनी दृष्टि और उसकी आदतें भी शामिल है।’ लगा किताब मुझे, अपने विशाल विस्तार में गोते लगाने के लिए बुला रही है। गोया, लेखक नें भी इस विस्तार को कई बार धूप की नदी के रूप में अभिव्यक्त किया है। आदिवासी अंचल की जानकारी, यात्रा विवरण, रचनाकार की दृष्टि एवं रचनाकार की आदतें सब एक साथ अपने सुगढ़ सांचे में फिट शब्दों के रूप में आंखों से दिल में उतर रहे थे। दिल में इसलिए कि रचनाकार नें किताब को अपने मित्र को समर्पित करते हुए लिखा ‘अपनी उस बेव़कूफ सी दोस्त के लिए जिसकी दोस्ती मैं सम्हाल नहीं पाया और अब उसका पता भी मेरे पास नहीं ...।’ इसे पढ़नें के बाद इतना तो तय हो जाता है कि आगे किताब के पन्नों पर दिल धड़केगा, रूमानियत और इंशानी इश्क की पोटली से उठती खुश्बू अलिराजपुर के मेले से होते हुए भोपाल तक महकेगी। 

लेखक किताब की भूमिका में बताते हैं कि मध्य प्रदेश साहित्य परिषद द्वारा प्रदेश के 16 वरिष्ठ साहित्यकारों को आदिवासी क्षेत्रों में अध्ययन के लिए भेजा गया था। लेखक नें अपनी स्वेच्छा से आदिवासी क्षेत्र झाबुआ अंचल को अध्ययन के लिए चुना और यह संस्मरण उसी अध्ययन का प्रतिफल है। लेखक अपनी भूमिका में ही नायिका हीरली और नायक खुमfसंग का हल्का सा चित्र खींचते हैं। आदिवासी झाबुआ के भगोरिया मेले में आदिवासी बालायें प्रेमियों के साथ भागकर व्याह रचाती हैं। हीरली भी इसी मेले में अपने पहले पति को छोड़कर खुमfसंग के साथ भागी थी। आगे बढ़ते हुए लेखक स्पष्ट करते हैं कि यह किताब नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन के लिए नही है। 

अपनी बातें शुरू करने के पहले वे एक कविता भी प्रस्तुत करते हैं जिसमें fसंदबाद, मार्कोपोलो, ह्वेनसांग, फाह्यान व राहुल सांकृत्यायन के बाद की कड़ी में अपने आप को रखते, यायावरों की सांस्कृतिक परम्पराओं का निर्वाह करते हुए, अपरिचित ठिकानों से हमें परिचित भी कराते चलते हैं। लेखक यात्रा का पता ठिकाना बताते हुए अपने शब्दों के साथ ही पढ़नें वाले को भी झाबुआ के दिलीप fसंह द्वारा से आदिवासी भीलों की आदिम सत्ता में प्रवेश कराते हैं जहां आदिवासी भीलों की अपनी आचार संहिता है। साथ है आनंदी लाल पारीख , जो प्रसिद्ध छायाकार है और गुजरात, राजस्थान की सीमा से लगे मध्य प्रदेश के इस आदिवासी भूगोल के चप्पे चप्पे के जानकार हैं। अरावली पर्वत से गलबईहां डाले अनास और पद्मावती नदी के कछारों व पहाड़ों में समय के मंद आंच में निरंतर fसंकती भीलनियों के साथ ‘डूंगर खॉंकरी’ व ‘ग्वाल टोल’ खेलते हुए। कपास धुनकिए के आवाज में धुन मिलाते हुए भटकते हुए। 

किताब के शीर्षक कील कॉंटे कमन्द के साथ लेखक उस लापता मित्र वीणा परिहार से भी मिलवाते हैं जो असामान्य कद की लम्बी महिला हैं और कटे बालों के साथ झाबुआ के महाविद्यालय में प्राध्यपक हैं। लेखक नें यद्यपि उनका कद किसी फीते में नापा नहीं है किन्तु साथ चलते हुए परछाइयों में उसका यह कद दर्ज हुआ है। वह अंग्रेजी साहित्य में चर्चित शब्द ‘हस्की वॉइस्ड’ सी लगती है किन्तु लेखक उसकी प्रशंसा करते सकुचाते हुए से कहते हैं ‘... हमारे सामाजिक शिष्टाचार की संहिता में ‘सेक्सी ब्यूटी’ को ‘काम्पलीमेंट’ (प्रशंसा) अथवा ‘एप्रीशिएट’ (सराहना) करना तक जोखिम से भरा हो सकता है।’ लेखक के इस वाक्यांश से वीणा परिहार को समझ पाना आसान हो उठता है। सुकून मिलता है जब पता चलता है कि सुदूर कानपुर उत्तर प्रदेश से मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल में अकेली रहती उस अकेली लड़की के अकेलेपन में उसका ईश्वर भी हैं।

सफर के पहले पड़ाव के रूप में गझिन अमराई, पद्मावती नदी, काकनवानी, चाक्लिया गॉंव, चोखवाड़ा गढ़ी के आसपास के आदिवासी fस्त्रयों के स्तन-सूर्य का आख्यान, उनकी संस्कृति, सौंदर्यानुभूति को छूते हुए, मालवा के पारंपरिक दाल बाफले और चूरमे के सौंधी महक और भूख के साथ दिया बाती के समय में, जरायम पेशा भीलों की बस्ती बालवासा गॉंव मे, जब लेखक पहुचता है, तो ढ़िबरियों की रौशनी में गॉंव का सरपंच और लेखक का मेजबान रामसिंग कहीं खो जाता है। रामसिंग राजस्थान के किसी गॉंव में हालिया डाका डालकर यहॉं छुपा बैठा है और पुलिस उसे तलाश रही है। लेखक अपने यात्रा के सामान के साथ गॉंव में भोजन के लिए जलते लकड़ी के चूल्हे के बहाने परिवार की एकजुटता और परिभाषा की कल्पना करता है।

मेजबान रामसिंग के व्यक्तित्व की बानगी करते हुए लेखक उस अंचल के भीलों के जीवन में झांकते हैं। घटनाओं को जीवन और कल्पनाओं से जोड़ते हैं। यादों में झाबुआ के इस बीहड़ गॉंव में यात्रा प्रारंभ करने के पूर्व झाबुआ कलेक्टर के नाम जारी म.प्र.साहित्य परिषद एवं अदिवासी कल्याण विभाग से जारी अध्ययन यात्रा में सहयोग करने की अनुशंसा पत्र की अहमियत पर सवाल उठाते हैं। उस पत्र की फटी पुर्जी के पृष्ट भाग पर अपना नाम लिखकर कलेक्टर से मिलने के लिए भिजवाते हुए इस व्यवस्था को सिर झुकाकर स्वीकार भी करते हैं। 

किताब की नायिका हीरली के गॉंव गुर्जर संस्कृति से ओतप्रोत, अलिराजपुर में भीलों के धातक घेरे का विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि कैसे भीलनी हीरली नें अपने पहले पति को छोड़कर अपने प्रेमी के साथ भागी थी और उसके भाई नें जब उसके प्रेमी को मारने के लिए तीर छोड़ा था तो वह सामने आ गई थी, उसके शरीर को बेधते हुए पांच तीर लगे थे और वह आश्चर्यजन रूप से बच गई थी। ताड़ी के मदमस्त नशे में होते अपराध, नशे के कारण होते अपनों के बीच की मार काट, सजा आदि की पड़ताल किताब में होती है। fहंसा के विरूद्ध प्रेम की सुगंध दृश्य अदृश्य रूप से महकता है।

लंका जैसे भौगोलिक आकृति के गॉंव साजनपुर में ताहेर बोहरा की कहानियॉं यत्र तत्र बिखरी हैं, खतरे वाले 16 किलोमीटर के घेरे में बिखरे इन कहानियों को लेखक बटोरता है और सीताफल की दो टोकरियॉं साथ लेकर लौटता है। लेखक चांदपुर, छोटा उदयपुर, छकतला गॉंव व नर्मदा बचाओ आन्दोलन के नवागाम बांध को समेटते हुए कर्मचारियों के स्थानांतरण के हेतु से सिद्ध कालापानी क्षेत्र के गांव मथवाड़ जहॉं भिलाला आदिवासियों की आबादी है, से साक्षात्कार कराता है। झाबुआ के लघुगिरिग्राम माने हिल रिसोर्ट आमखुट की यात्रा रोचक है। लेखक का 100 वर्ष पुराने चर्च की मिस ए.हिसलॉप यानी मिस साहेब से विक्टोरियन शैली की मकान मे मुलाकात, आदिवासी अंचलों में हो रहे धर्मांतरण के नये अर्थ गढ़ते हैं। केरल से आकर पुरसोत्तमन का वहॉं आदिवासियों के बीच काम करना, कुलबुलाते प्रश्न की तरह उठता है जिसका जवाब वे स्वयं देते हैं ‘... आदिवासी असंतोष और पृथकतावादी आन्दोलनों के आपसी रिश्ते मुझे एक त्रिकोण में मिलते हुए दिख रहे थे।’ आमखुट में विचरते हुए चंद्रशेखर आजाद भी सोरियाये जाते हैं, यहॉं अलिराजपुर और जोबट के बीच छोटी सी बस्ती भाबरा है जहॉं चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ था। ऐसी कई नई जानकारियॉं हौले से बताते हुए वे इस तरह शब्दों के माध्यम से यात्रा में साथ ले चलते हैं कि समूचा परिदृश्य जीवंत हो उठता है।

मानव स्वभाव है कि वह अनचीन्हें को अपने आस पास के प्रतीकों से जोड़ता है, शायद इसीलिए वे पूरी यात्रा में वहॉं के स्थानों, व्यक्तियों से छत्तीसगढ़ की तुलना करना नहीं भूलते जिसके कारण अनचीन्हें परिदृश्य बतौर छत्तीसगढ़िया मेरे लिए सुगम व बोधगम्य हो उठते हैं। किताब पढ़ते हुए लगता है कि लिखते हुए अंग्रेजी साहित्य उनके जेहन में छाए रहता है वे कई जगह अंग्रजी साहित्य के चर्चित पात्रों व घटनाओं को यात्रा के दौरान के पात्रों और घटनाओं से जोड़ते हैं। शिविर समेटते हुए उनके लेखन में झाबुआ कलेक्टर के साहित्य के प्रति घोर अरूचि और आई.ए.एस. प्रशिक्षार्थी विमल जुल्का का साहित्य प्रेम भी प्रगट होता है जो नौकरशाहों की संवेदनशीलता का स्पष्ट चित्र खींचता है। यात्रा में कई सरकारी व असरकारी सहयोगियों का उल्लेख आता है जिनमें से लेखक आदिवासी लोक के चितेरे झाबुआ क्षेत्रीय ग्रामीण बैक के अध्यक्ष सुरेश मेहता का उल्लेख करते हैं जो संभवतः वही हैं जिनके साथ लेखक नें बस्तर के घोटुलों की यात्रा की थी। लोक कलाओं, परंपराओं और संस्कृतियों पर चर्चा करते हुए वे झाबुआ के कपड़े और तिनके से कलात्मक गुड़िया के निर्माण को कोट करते हैं जो झाबुआ के लोक कला को अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान देनें में सक्षम है। इस पर जमीन से जुड़ाव के मुद्दे पर कहते हैं कि ‘.. लोक कलाओं को उसके नैसर्गिक परिवेश से अलग करके उनकी सहज स्वाभाविकता में ग्रहण नहीं किया जा सकता।’ 

यात्रा के दौरान बिम्बों, प्रतीकों, परम्पराओं के माध्यम से वे आदिवासी अंचल का विश्लेषण करते हैं। छोटी सी छोटी और नजरअंदाज कर देने वाली बातों, घटनाओं से भी वे चीजें बाहर निकालते हैं। वे नदी पार करते हुए नदी में पानी भरने आई भीलनियों के पात्रों से भी भीलों की सामाजिक आर्थिक संरचना का अंदाजा लगाते हैं। कल कल करती नदी को धूप की नदी कहते हैं, यह उनकी अपनी दृष्टि है एवं कल्पना है जिसके विस्तार का नाम है कील काटे कमन्द।

संजीव तिवारी
14.04.2014

कील कॉंटे कमन्द
सतीश जायसवाल
प्रकाशक मेधा बुक्स, एक्स 2, 
नवीन शाहदरा, दिल्ली 110 032, 
फोन 22 32 36 72
प्रथम संस्करण, पृष्ट 140, 
हार्ड बाउंड, मूल्य 200/- 
आवरण चित्र डा.सुनीता वर्मा

सतीश जायसवाल
कृतियॉं - 
कहानी संग्रह - जाने किस बंदरगाह पर, धूप ताप, 
कहॉं से कहॉं, नदी नहा रही थी
बाल साहित्य - भले घर का लड़का, हाथियों का सुग्गा
मोनोग्राफ - मायाराम सुरजन की पत्रकारिता पर केfन्र्गत
संपादन - छत्तीसगढ़ के शताधिक कवियों की कविताओं का संग्रह कविता छत्तीसगढ़ 
यह पोस्‍ट मेरे ब्‍लॉग आरंभ में यहॉं भी है.

तुरते ताही : कविता का सौंदर्य


पिछले दिनों भिलाई की बहुचर्चित कवियत्री व समाज सेविका नीता काम्बोज ‘सिरी’ के पहले कविता संग्रह का विमोचन हुआ जिसमें शामिल होने का सौभाग्यी प्राप्त हुआ. खुशी हुई कि कवियत्री का पहला कविता संग्रह प्रकाशित हो रहा है. इसके पूर्व मैं कवियत्री नीता काम्बोकज ‘सिरी’ के गीतों को कवि सम्मेलन और गोष्ठियों में सुनते रहा हूं. जहॉं उनके कुछ गीतों में व्याक्तिगत तौर पर मुझे उथली तुकबंदी एवं कविता की अकादमिक कसौटी की कमी नजर आती थी. उनका व्यक्तित्व‍ बेहद सहल है और उनमें बच्चों सी निश्छलता है. इस संग्रह के प्रकाशन के बाद मैं आशान्वित था कि कवियत्री नें अपनी कविताओं को प्रकाशन एवं मंच के अनुरूप अलग अलग छांटा होगा एवं अपनी श्रेष्ठ कविताओं को प्रकाशित करवाया होगा जिसमें उनकी कविताई का उचित मूल्यांकन हो पायेगा, क्योंकि उनमें कविता की पूरी समझ नजर आती है. इसके अतिरिक्त दूसरा तथ्य यह भी था कि यह कविता संग्रह ‘दृष्टिकोण’ डॉ.सुधीर शर्मा के वैभव प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है तो निश्चित है डॉ.सुधीर शर्मा नें कविताओं की वर्तनीगत व्याकरणिक भूलों को अकादमिक स्वरूप अवश्य प्रदान किया होगा. तीसरे तथ्य के रूप में अशोक सिंघई का भूमिका लेखन अहम रहा है क्योंकि अशोक सिंघई छत्तीसगढ़ के ऐसे कवि हैं जो पूरे भारत में हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि के रूप में जाने जाते हैं, यहॉं मैं यह स्पष्ट कर दूं कि डॉ. विमल कुमार पाठक नें भी इस किताब पर अपनी लेखनी बिखेरी है किन्तु मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें हिन्दी कविता के संबंध में योग्य टिप्पणीकर्ता स्वीकार नहीं करता, इस पर बातें कभी और.

विमोचन कार्यक्रम में संकलन के संबंध में आमंत्रित वक्ताओं में अशोक सिंघई, डॉ.निरूपमा शर्मा, डॉ.रमेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ.नलिनी श्रीवास्तव नें विस्तार से अपनी समीक्षात्मक टिप्प्णियॉं दी एवं आधार वक्तव्य सरला शर्मा नें दिया. सभी नें नीता काम्बोज ‘सिरी’ की कविताओं को मुक्त‍ कंठ से सराहा. सरला शर्मा नें पूरे संग्रह में नारी अस्मिता का ध्वज फहराते नीता काम्बोज ‘सिरी’ की उस कविता का जिक्र किया जिसमें उसने पति की दूसरी पत्नी सौत पर कविता लिखी है. सरला शर्मा नें अपनी जानकारी के अनुसार इस कविता को किसी नारी के द्वारा लिखी गई अपने ढ़ंग की निराली कविता माना और कहा कि यह अकेली कविता इस संग्रह की जान है यह कविता कवियत्री को दीर्घजीवी बनायेगी. हिन्दी के वरिष्ठ कवि अशोक सिंघई नें अपने वक्तव्यव में बहुत सहज रूप से बतलाया कि अनुभवजन्य अतीत व जीवन की विसंगतिपूर्ण घटनाओं से उत्प‍न्न‍ भावों में कविता सृजित हो जाती है. उन्होंनें कविता को साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित होने में लगने वाले समय एवं कविता की श्रेष्ठता पर विस्तार से प्रकाश डाला. मैं स्पष्ट‍ कर दूं कि अशोक सिंघई यह बातें नीता काम्बोज ‘सिरी’ की कविताओं के संबंध में ही बोल रहे थे, उन्होंनें लक्षित रूप से नीता काम्बोज ‘सिरी’ को मंचीय कविता से परे साहित्य के द्वार में प्रवेश का राह बता रहे थे. नीता काम्बोज ‘सिरी’ नें अशोक सिंघई के इन गूढ़ बातों को कहॉं तक अमल में लाया यह तो उनकी दूसरी किताब में नजर आयेगी. बहरहाल इस कार्यक्रम नें सिद्ध किया कि नीता काम्बोज ‘सिरी’ को अपनी कविताओं के प्रति और भी गंभीर होने की जरूरत है.

कविता बहुत ही गंभीर विधा है इसे रचने वाले एवं पढ़ने वाले दोनों की गंभीरता से ही कविता अपने सामाजिक स्वरूप को व्यापक तौर पर व्यक्त कर पाती है, कविता का सौंदर्य तब और निखरता है. मंचीय कविता को साधना है साथ ही राजनैतिक व्यक्तित्व निखारना है तो स्थानीय मीडिया एवं स्थानीय चाटुकारों का सामंजस्य आवश्यक है. किन्तु जब हम जिसे कविता कह रहे हैं उसे साधना है तो इन सबको एक तरफ रख कर मुक्तिबोधों, पाशों, धूमिलों, नार्गाजुनों से लेकर विनोद कुमार शुक्लों, कमलेश्वरों, नरेश सक्सेनाओं, निशांतों, वर्तिका नंदाओं, आदि इत्यादि की कविताओं से भी गलबंहियां लेना पडेंगा. तभी डॉ.ओम निश्चल जैसे कविता के निर्मम आलोचकों की नजरों में उतरते हुए साहित्य जगत में स्थान मिल पायेगा. तब निश्चित है कि उनकी कविताओं को बिना नमस्कार चमत्कार के स्था‍नीय मीडिया ही नहीं राष्ट्रीय मीडिया भी तवज्जों देगी.

विमोचन कार्यक्रम में नीता आमंत्रित विशिष्‍ठ अतिथियों को दृष्टिकोण की प्रति हस्‍ताक्षर कर कर के प्रदान कर रही थी, हम इंतजार कर रहे थे कि हमें भी अब मिली कि तब पर जब प्रति नहीं मिली तब पता चला कि हमारी औकात क्‍या है. :) डॉ.सुधीर शर्मा नें कार्यक्रम में मेरे पहुचते ही मंच से मेरा स्‍वागत किया था और मेरे तथाकथित सम्‍मान में दो शब्‍दों के कसीदे भी पढ़े थे तो लगने लगा था कि विशिष्‍ठ भले ना सहीं शिष्‍ठ तो बने रहूं. (दो ठो स्‍माईली); विमोचन कार्यक्रम  के उपरांत बख्शी सृजन पीठ के द्वारा ‘दृष्टिकोण’ की एक प्रति नीलम चंद जी सांखला, दंतेवाड़ा को पहुचाने के लिए मुझे डकहार के रूप में प्रदान किया गया. यह मेरे लिए बहुत ही बड़े सौभाग्य की बात थी कि एक नजर कविताओं पर डाल सकूं किन्तु आपाधापी में मैं इस संग्रह की कविताओं को पढ़ नहीं पाया. संग्रह पढ़ने के बाद कोशिस करूंगा कि कुछ और लिखूं. अभी कवियत्री नीता काम्बोज ‘सिरी’ को इस संग्रह के लिए अनेकानेक शुभकामनायें.

तमंचा रायपुरी

पुस्तक-समीक्षा: संघर्षाग्नि का ताप केरवस

छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य में उपन्‍यास लेखन की परम्‍परा नयी है, उंगलियों में गिने जा सकने वाले छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यासों की संख्‍या में अब धीरे धीरे वृद्धि हो रही है। पिछले दो तीन वर्षों में कुछ अच्‍छे पठनीय उपन्‍यास आये हैँ । इसी क्रम में अभी हाल ही में प्रकाशित छत्‍तीसगढ़ी, हिन्‍दी, उर्दू और गुजराती के स्‍थापित साहित्‍यकार मुकुन्‍द कौशल द्वारा लिखित छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास ‘केरवस’ भी प्रकाशित हुआ है। ‘केरवस’ सत्‍तर के दशक के छत्‍तीसगढ़ का चित्र प्रस्‍तुत करता है। ‘केरवस’ की कथा और काल उन परिस्थितियॉं को स्‍पष्‍ट करता है जिनके सहारे वर्तमान विकसित छत्‍तीसगढ़ का स्‍वरूप सामने आता है। विकासशील समय की अदृश्‍य छटपटाहट उपन्‍यास के पात्रों के चिंतन में जीवंत होती है। उपन्‍यास को पढ़ते हुए यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि यह उपन्‍यास लेखक का भोगा हुआ यथार्थ है। नवजागरण के उत्‍स का दस्‍तावेजीकरण करता यह उपन्‍यास सत्‍तर के दसक में उन्‍नति की ओर अग्रसर गॉंव की प्रसव पीड़ा की कहानी कहता है। अँधियारपुर से अँजोरपुर तक की यात्रा असल में सिर्फ छत्‍तीसगढ़ की ही नहीं अपितु गॉंवों के देश भारत की विकास यात्रा है। यह उभरते राज्‍य छत्‍तीसगढ़ के गॉंवों में आ रही वैचारिक क्रांति की कहानी है।

उपन्‍यास में शांत दिखते गॉंव अँधियारपुर में शोषण व अत्‍याचार से पीड़ितों की चीत्‍कारें दबी हुई हैँ , विरोध के स्‍वरों पर राख पड़ी हुई हैँ । सेवानिवृत चंदेल गुरूजी इसे वैचारिक हवा देते हैँ और नवजागरण का स्‍वप्‍न युवा पूरा करते हैँ । अलग अलग छोटी छोटी कहानियां की नदियॉं एक बड़ी नदी से मिलने के लिए साथ साथ चलती है और समग्र रूप से साथ मिलकर उपन्‍यास का रूप धरती है।

उपन्‍यास का कथानक अँजोरपुर के बड़े जलसे से आरंभ होता है जहॉं डीएसपी बिसाल साहू व उसकी पत्‍नी निर्मला गॉंव की ओर जीप से जा रहे हैँ । बिसाल साहू की यादों में उपन्‍यास आकार लेने लगता है। गॉंव के आयोजन में शामिल होने के लिए अन्‍य अधिकारियों के साथ ही अँधियारपुर निवासी स्‍टेनों फूलसिंह भी जा रहा है। वही जीप में बैठे अधिकारियों को अँधियारपुर से अँजोरपुर बनने का किस्‍सा बताता है। उपन्‍यास का कथानक वर्तमान और भूत के प्‍लेटफार्म को फलैशबैक रूप में प्रस्‍तुत करते हुए आगे बढ़ता है। अँधियारपुर के मालगुजार सोमसिंह, लालच में थुलथुल शरीर वाली कन्‍या केंवरा से अपने पुत्र मालिकराम का विवाह करवा देता है। मालिकराम रायपुर में वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर गॉंव आकर रहने लगता है। गॉंव के गरीब किसानों को कर्ज देकर उनके जमीनों को अपने नाम कराने और शोषण व अत्‍याचार करने का उसका पारंपरिक कार्य आरंभ हो जाता है। मालिकराम सहकारी समितियों से कृषि कार्य के लिए खुद अपने नाम से एवं अपने कर्मचारियों के नाम से कर्ज लेता है पर उसे चुकाता नहीं। उसके दबदबे के कारण उससे कोई वसूली करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाता। परेशान गॉंव में एसे ही किसी दिन एक समिति सेवक मोहन सोनी पहुँचता है और हिम्‍मत करके मालिकराम को समिति का मॉंग पत्र पकड़ा देता है। गॉंव में अदृश्‍य क्रांति का बिगुल उसी पल से फूँक दिया जाता है। समिति प्रबंधक के प्रयास से मालगुजार मालिकराम बैंक का कर्ज चुका देता है। सोनी बाबू समिति के लिए मेहनत करता है और कृषि विकास समिति को नया जीवन देता है। समिति सेवक जिसे गॉंव वाले बैंक बाबू या सोनी बाबू कहते हैँ वह परभू मंडल के घर में रहने लगता है। घर में केजई और उसकी बेटी मोंगरा भी रहते हैँ ।

गॉंव में अनेक कहानियॉं संग चलती हैं उनमें से कालीचरण की कहानी आकार लेती है। पत्‍नी की असमय मौत से विधुर हो गए कालीचरण नाई के छोटे बच्‍चे राधे को पालने का भार कालीचरण पर रहता है। कालीचरण मालिकराम जमीदार के घर में काम करता है इस कारण वह बच्‍चे की देखभाल नहीं कर पाता। एक दिन गॉंव के सब लोग उसके घर के सामने इकट्ठे हो जाते हें क्‍योंकि गॉंव वालों को खबर लगती है कि कालीचरण एक औरत को घर लेकर आया है। गॉंव वालों को कालीचरण बताता है कि वह दरभट्ठा के बस स्‍टैंड में होटल चलाने वाली चमेली यादव की बेटी है, चमेली को वह बस स्‍टैंड में ही मिली थी जब उस बच्‍ची को कोई वहॉं छोड़ दिया था। रूपवती बिलसिया अपने प्रेम व्‍यवहार से काली ठाकुर और उसके बच्‍चे का दिल जीत लेती है। गॉंव में उसके रूप यौवन की चर्चा रहती है वैसे ही उसके व्‍यवहार की भी चर्चा रहती है। कालीचरण के साथ ही बिलसिया भी मालिकराम के यहॉं काम करने जाने लगती है।

लेखक नें बिलसिया को मालगुजार मालिकराम के प्रति स्‍वयं ही आकर्षित होते हुए दिखाया है। यह बिलसिया जैसी रूपवती चिर नौयवना के हृदय में भविष्‍य के प्रति सुरक्षा के भाव को दर्शाता है। बिलसिया का अपने पति व मालिकराम के अतिरिक्‍त किसी अन्‍य के साथ दैहिक संबंधों का कोई उल्‍लेख उपन्‍यास में नहीं आता। मालिकराम और बिलसिया दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित रहते हैँ । मालगुजार को बिना दबाव के सहज ही बिलसिया की देह मिल जाता है। मालिकराम एक बिलसिया से ही संतुष्‍ट नहीं होता वह नित नये शिकार खोजता है इसी क्रम में वह बाड़े में काम करने वाले कासी की नवयौवना बेटी गोंदा का शिकार करता है। मालिकराम के कुत्सित प्रयासों से गोंदा को गर्भ ठहर जाता है। लेखक नें इस घटना को मालिकराम के चरित्र को प्रस्‍तुत करने के लिए बड़े रोचक ढ़ग से लिया है हालांकि गोंदा के गर्भ ठहरने पर मालिकराम की पत्‍नी का नारीगत विरोध के अतिरिक्‍त उपन्‍यास में आगे कोई प्रतिक्रया नहीं है। मालिकराम के द्वारा गॉंव की औरतों के शारिरिक शोषण के चित्र को स्‍पष्‍ट करने के लिए लेखक नें ‘खास खोली’ का चित्र उकेरा है जो मालिकराम के एशगाह को नित नये शोषण का साक्षी बनाती है। कथा के अंतिम पड़ाव पर इसी कुरिया में बिलसिया मालगुजार को अपनी देह सौंप कर अपने परिवार के प्रति निश्चिंत हो जाती है।

गॉंव में शहर से आई रमशीला देशमुख उर्फ रमा, स्‍कूल में शिक्षिका है वह स्‍वाभिमानी है व अपने कर्तव्‍यों के प्रति सजग है। मालिक राम चाहता है कि वह उसके द्वार पर हाजिरी लगाने आए किन्‍तु वह नहीं जाती। सुखीराम एक मेहनतकश किसान है जो अपनी पत्‍नी अमरबती और बेटी दुरपती के साथ गॉंव में रहता है। दुरपति गॉंव में ही पढ़ती है और शाम को सोनी बाबू के पास पढ़ने आती है। सुखीराम का एक बेटा है जो शहर में रह कर पढ़ाई कर रहा है, सुखीराम नें अपने बेटे कन्‍हैंया की पढ़ाई के लिए मालिकराम से कर्ज लिया है उसके लिए मालिकराम उसे बार बार तंग करता है। सुखीराम हाड़तोड़ मेहनत कर कुछ पैसे इकट्ठे करता है , उसके पास दुविधा है कि वह पैसों से बेटी के हाथ पीले करे या जमीदार का कर्ज लौटाये?

मनबोधी साहू किसान है और गॉंव में किराना एवं कपड़ा दुकान भी चलाता है, उसका बेटा बिसाल शहर से पढ़ कर गॉंव आता है। बिसाल और कन्‍हैया दोनों बचपन के दोस्‍त हैँ । बिसाल पढ़ाई के साथ ही संगीत में भी प्रवीण है, उसका गला अच्‍छा है। पड़ोस के गॉंव में एक बार रामायण गायन प्रतियोगिता आयोजित होती है जिसमें गॉंव वालों के साथ बिसाल भी भाग लेने जाता है। वहॉं उद् घोषिका निर्मला, उसे भा जाती है, दोनों परिवार की रजामंदी से उनका विवाह हो जाता है। सत्‍तर के दसक में छोटे से गॉंव में अपनी संस्‍कृति के प्रति प्रेम के बरक्‍स बच्‍चों को डॉक्‍टर इंजीनियर बनाने की होड़ को पीछे छोड़ती निर्मला नें संगीत में स्‍नातक किया है।

इधर नौकरी नहीं मिलने से कन्‍हैया गॉंव वापस आ जाता है। स्‍कूल शिक्षिका रमा से उसकी अंतरंगता बढ़ने लगती है। इस प्रेम के अंकुरण के साथ ही दमित शोषित समाज को मुख्‍यधारा में लाने का प्रयास दोनों के संयुक्‍त नेतृत्‍व से आरंभ हो जाता है। बिसाल एवं अन्‍य युवा इसमें सक्रिय योगदान करने जुट जाते हैँ ।

गॉंव में एक सेवानिवृत शिक्षक चंदेल भी रहते हैँ जो गॉंव में नवजागरण के स्‍वप्‍न सँजोए गॉंव वालों को जगाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैँ। वे समय समय पर गॉंव की उन्‍नति, मालगुजार के शोषण व अत्‍याचार से मुक्ति एवं पृथक छत्‍तीसगढ़ राज्‍य के लिए क्रांति करने को प्रेरित करते रहते हैँ । गॉंव में कन्‍हैया, बिसाल और रमा के आने से युवा लोगों का उत्‍साह बढ़ता है और वे चंदेल गुरूजी की बातों से प्रभावित होने लगते हैँ । युवाओं में विद्रोह की भावना प्रबल होने लगती है और मालगुजार इस विद्रोह को दबाने के लिए पुलिस से मदद पाने की जुगत भिड़ाता है, और एक नामी लठैत को घर में बुलवाता है।

गॉंव में दहशत फैलाने के उद्देश्‍य से मालिकराम लठैत के साथ घूमता है व अपने कर्ज में दिए गए पैसे की वसूली मार पीट कर करता है ऐसे ही दबावपूर्ण परिस्थितियों में एकदिन मालिकराम और गुंडों के द्वारा मारपीट करने से सुखीराम की मौत हो जाती है। कन्‍हैया के पिता की मौत से विद्रोह का शंखनाद हो जाता है। लेखक नें विद्रोह और उसके बाद की क्रमबद्धता को बहुत जल्‍द ही समेट दिया है कुछ ही पैराग्राफों के बाद जमीदार के घर में घुस आए युवक खाता बही और जबरदस्‍ती अंगूठा लगा लिए गए स्‍टैम्‍प पेपरों की होली जला देते हैँ और चुटकियों में रावण का अंत हो जाता है जैसे दशहरे में कृत्तिम रावण पल भर में जल जाता है।

ग्राम सेवक सोनी गॉंव में सांस्‍कृतिक चेतना जगाता है और अपने कर्तव्‍यों के उचित निर्वहन के साथ ही कृषि सहकारिता के विकास में अपना सक्रिय योगदान देता है। शहर से पढ़कर गॉंव आने वाला कन्‍हैया रमा से विवाह करके, गॉंव में ही बस जाता है और अपने गॉंव का सर्वांगीण विकास का सपना साकार करते हुए सरपंच चुना जाता है। गॉंव का अंधकार मिट जाता है और गॉंव में चारो ओर विकास, सुख व संतुष्टि का उजाला फैल जाता है। लेखक का प्रतिनायक उपन्‍यास के अंत में कहीं गायब हो जाता है, मरता नहीं। जैसे लेखक कहना चाह रहा हो कि शोषण और अत्‍याचार का अभी अंत नहीं हुआ है, उसे हमने अपने संयुक्‍त प्रयासों से दूर भले भगा दिया है वो फिर आयेगा रूप बदल कर, हमें सावधान रहना है।

मुकुन्‍द कौशल जी की विशेषता रही है कि, वे अपनी कविताओं में बहुत सहज और सरल रूप से पाठकों को तत्‍कालीन समाज की जटिलता से वाकिफ कराते है। इस उपन्‍यास में भी उनकी यह विशेषता कायम है, पात्रों का चयन, कथोपकथन, पात्रों के कार्य व्‍यवहार, घटनाक्रम का विवरण एवम् परिस्थितियों का चित्रण वे इस प्रकार करते हैँ कि उपन्‍यास के मूल संदेश के साथ छत्‍तीसगढ़ के ग्रामीण समाज को समझा जा सके। लेखक नें काली नाई की पत्‍नी बिलसिया के चरित्र के चित्रण में इसी प्रकार की विसंगतियों का चित्रण किया है, उपन्‍यास में उसे बिना मा बाप की अवैध संतान बताया है जिसे बस स्‍टैंड के होटल वाले पालते हैँ , लेखक नें उसकी खूबसूरती का भी बहुत सजीव चित्रण किया है, उसमें प्रेम दया के भाव कूटकूट कर भरे हैँ । कथा में वह अपने पति की पहली पत्‍नी के बेटे को उसी प्रकार स्‍नेह देती है जैसे वह उसका खुद का बेटा हो। वह अपने पति का ख्‍याल रखते हुए भी जमीदार को जीतने का ख्‍वाब रखती है और अपने रूप बल से उसे जीतती भी है। कथाक्रम में स्‍वयं की पत्‍नी और काली को, जमीदार मरवा देता है जिसे दुर्घटना का रूप दे दिया जाता है। बिलसिया अपने पति की मृत्‍यु के बावजूद जमीदार की सेज पर जाती है। लेखक नें उपन्‍यास में लिखा है - ‘बिलसिया ह आज अड़बड़ खुस हे, अउ काबर खुस नइ होही आज त ओकर मनौती अउ परन पूरा होवइया हे। अपन नवा रेसमइहा लुगरा ला बने डेरी खंधेला पहिर के चेहरा म चुपरिस पावडर, होठ म लगाइस लाली अउ गोड म रचाइस माहुर। अँगरी मन म नखपालिस रचा के पहिरिस तीनलड़िया हार। कान म झुमका अउ अँगरी म अरोइस मुँदरी। कपार म टिकली चटका के, सिंघोलिया ले चुटकी भर सेंदुर निकाल के भरिस अपन मॉंग, ते सुरता आगे राधे के ददा के।‘ यह दर्शाता है कि बिलसिया को अपने राधे की चिंता है, उपन्‍यास के अंत में लेखक नें राधे को सायकल में स्‍कूल जाते हुए दर्शाया है और बिलसिया को जमीदार के बाड़े में रहते हुए चित्रित किया है। सपाट अर्थों में इस वाकये को स्‍त्री स्‍वच्‍छंदता भले मान लिया जाए किन्‍तु उसके पीछे का गूढ़ार्थ नारी अस्मिता को भलीभांति स्‍थापित करता है। बिलसिया का द्वंद यह है कि मालिकराम उसके देह को छोड़ेगा नहीं और बिलसिया अपने पति और बच्‍चे को छोड़ेगी नहीं। इसका आसान सा हल मालिकराम के सम्‍मुख समर्पण के अतिरिक्‍त और कुछ भी नहीं है।

लगभग तीन दर्जन पात्रों के साथ गुथे इस उपन्यास के अन्य पात्रों में बेरोजगारी का दंश झेलते कन्हैया, गॉंव में शिक्षा का लौ जलाती रमा, क्रांति का मशाल थामे शहर से पढ़कर गॉंव आने वाला बिसाल, सेवानिवृत प्रधानाध्यापक बदरी सिंह चंदेल, स्वामी भक्त और किंकर्तव्‍यविमूढ़ कालीचरण नाई, गॉंव में सहकारिता और विकास के ध्वज वाहक सोनी बाबू जैसे प्रमुख पात्रों नें उपन्यास में छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जनता के असल चरित्र को व्यक्त किया है.

लेखक चंदैनी गोंदा, सोनहा बिहान एवं नवा बिहान जैसे छत्‍तीसगढ़ के भव्‍य व लोकप्रिय लोकनाट्य प्रस्‍तुतियों के गीतकार रहे हैँ । इन प्रस्‍तुतियों में वे पल पल साथ रहे हैँ इस कारण उन्‍हें पटकथा के गूढ़ तत्‍वों का ज्ञान है जिसको उन्‍होंनें उपन्‍यास में उतारा है। पढ़ते हुए ऐसे लगता है जैसे घटनायें ऑंखों के सामने घटित हो रही है, उपन्‍यास का कथोपकथन कानों में जीवंतता का एहसास कराता है। उपन्यासकार नें कथोपकथन के सहारे कथा को विस्तारित करते हुए सहज प्रचलित शब्दों का प्रयोग कर संवाद को प्रभावपूर्ण बनाया हैँ . एक संवाद में चंदेल गुरूजी गॉंव वालों के मन में ओज भरते हुए छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा बहुत सहज ढ़ंग से कहते हैँ , जो पाठक के मन में भी माटी प्रेम का जज़बा भर देता है— ‘ये माटी अइसन’वइसन माटी नोहै रे बाबू हो, ये माटी बीर नरायन सिंह के, पं. सुन्‍दरलाल के, डाकुर प्यारेलाल सिंह अउ डॉ.खूबचंद बघेल के जनम देवईया महतारी ए। महानदी, अरपा, पैरी, खारून, इन्द्रावती अउ सिउनाथ असन छलछलावत नंदिया के कछार अउ फागुन, देवारी, हरेली, तीजा’पोरा असन हमर तिहार।‘ उपन्यास के नामकरण को स्पष्ट करता हुआ एक कथोपकथन उपन्यास में आता है जिसमें दुरपति और सहोद्रा बड़े दिनों के बाद मिलकर बातें कर रहे हैँ उनके बीच जो बातें हो रही है उसमें गूढ़ शब्दों का प्रयोग हो रहा है. शहर में व्याही सहोद्रा जब गॉंव में रहने वाली महिलाओं के जन जागरण में शामिल होने पर सवाल उठाती है तब दुरपति कहती है '... बटलोही के केरवस त धोवा जाथे बहिनी, फेर उही केंरवस कहूँ मन म जामे रहिगे तब कइसे करबे? लगही त लग जाए, फेर केंरवस ये बात के परमान रिही के इहॉं कभू आगी बरे रिहिस ...’ उपन्यासकार कितनी सहजता से अपने पात्र के मुख से दर्शन की बात कहलवाते हैँ . शोषण, अन्याय, अत्याचार की आग के विरूद्ध यदि संघर्ष करना है तो उसका रास्ता भी आग से ही होकर जाता है. संघर्ष करने वालों को इस आग से जलना भी है और जलन की निशानी को बरकरार भी रखना है क्योंकि यह निसानी इस बात को प्रमाणित करती है कि हमने अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष किया था. यह संदेश है उन सभी दमित और शोषित जन के लिए कि हमारे मन में लगा केरवस प्रमाण है, हमारे संघर्षशील प्रकृति का, चेतावनी है कि हमें कमजोर समझने की भूल मत करना.

लेखक की मूल विधा काव्‍य है, वे छत्‍तीसगढ़ के स्‍थापित जनकवि हैँ । गद्य की कसौटी को वे भली भंति समझते हैँ इसी कारण उन्‍होंनें इस उपन्‍यास में शब्‍दों का चयन और प्रयोग इस तरह से किया है कि संपूर्ण उपन्‍यास में काव्‍यात्‍मकता विद्यमान है। कथानक के घटनाक्रमों और बिम्‍बों का चित्रण लेखक इस प्रकार करते हैँ कि संपूर्ण उपन्‍यास एक लम्‍बी लोकगाथा सी लगती है जो काव्‍य तत्‍वों से भरपूर नजर आती है। छत्‍तीसगढ़ी के मैदानी स्‍वरूप में लिखी गई इस उपन्‍यास की भाषा बोधगम्‍य है। सहज रूप से गॉंवों में बोली जाने वाली भाषा का प्रयोग इस उपन्‍यास में हुआ है।

उपन्‍यास में प्रयुक्‍त कुछ शब्‍दों में ऐसे शब्‍द जिन्‍हें हम बोलचाल में अलग अलग करके प्रयोग करते हैँ उसे लेखक नें कई जगह युग्‍म रूप में प्रस्‍तुत किया है जो पठन प्रवाह को बाधित करता है। हो सकता है कि प्रदेश के ज्‍यादातर हिस्‍से में इस तरह के शब्‍द प्रयोग में आते हों। कुछ शब्‍दों का उदाहरण प्रस्‍तुत कर रहा हूं – बड़ेक्‍जन, सबोजिन, बिजरादीस, सिपचाके, लहुटगे, टूरामन, जवनहामन, गुथागै, लहुटके आदि। व्‍यवहार में हम अंतिम शब्‍द पर ज्‍यादा जोर डालते हैँ इस कारण अंतिम शब्‍दों को अलग कर देने से अंतिम शब्‍द पर जोर ज्‍यादा पड़ता है। लेखक ने उपन्‍यास में फड़तूसाई, बंहगरी जैसे कुछ नये शब्‍द भी गढ़े हैँ और व्‍यवहार में विलुप्‍त हो रहे शब्‍दों को संजोकर उन्‍हें प्रचलन में लाया है जैसे पंगपंगावत, पछौत, साहीं, कॉंता, मेढ़ा, बँधिया सिल्‍ली, कड़क’बुजुर, मेरखू आदि। उपन्‍यास में आए उल्‍लेखनीय वाक्‍यांशों की बानगी देखिए – उत्‍साह में कूदकर आकास छूने की बात को कहते हैँ ‘उदक के अगास अमर डारिस’। प्रकृति चित्रण में वे शब्‍द बिम्‍बों का सटीक संयोजन करते हैँ ‘मंझन के चघत घाम मेछराए लगिस’, ‘फागुन अवइया हे घाम ह मडि़या-मडि़या के रेंगत हे’, ‘सुरूज ह बुड़ती डहार अपन गोड़ लमा डारे रहै, सांझ ह घलो अपन लुगरा चारोकती फरिया दे रहिस ...’ आदि। बढ़ती उम्र में गरीब किशोरी के शारीरिक बदलाव को बड़ी चतुराई से शालीन शब्‍दों में कहते हैँ ‘बाढ़त टूरी के देंह बिजरादीस’ इसी तरह मालिकराम के दैहिक शोषण से गभर्वती हो गई किशोरी के गर्भ को प्रकट करने के लिए लेखक लिखते हैँ ‘तरी डाहर फूले पेट ह लगा दीस लिगरी’। इसी तरह मजाकिया लहजे में प्रतिनायक के चरित्र को स्‍पष्‍ट करते हुए लेखक लिखते हैँ ‘जब चालीस कुकुर मरथे त एक सूरा जनम धरथे अउ चालीस सूरा मरथे तब एक मालिकराम।‘ इसी तरह से संपूर्ण उपन्‍यास में हास परिहास, दुख सुख और घटनाक्रमों को लेखक नें बहुत सुन्‍दर ढ़ग से प्रस्‍तुत किया है।

इन संपूर्ण विशेषताओं के बावजूद उपन्‍यास में कुछ छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों का प्रयोग व्‍यवहारगत कारणों से खटकता है किन्‍तु अभी छत्‍तीसगढ़ी भाषा का मानकीकृत रूप सामने नहीं आया है इसलिए मानकीकृत रूप में इसे स्‍वीकरना आवश्‍यक प्रतीत होता है। इसी तरह उपन्‍यास के शीर्षक के संबंध में मेरी धारणा या स्‍वीकृति ‘केंरवछ’ रही है जबकि उपन्‍यासकार नें इसे ‘केरवस’ कहा है। उपन्‍यास में दो तीन स्‍थान पर इस शब्‍द का प्रयोग हुआ है, उसमें संभवत: दो बार ‘केंरवस’ लिखा है। लेखक छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों के प्रति सजग हैँ इस कारण किंचित असहमति के बावजूद हम इसे स्‍वीकार करते हैँ और ‘केरवस’ को मानकीकृत रूप में स्‍वीकारते हैँ ।

छत्तीसगढ़ी की औपन्यासिक दुनिया बहुत छोटी है किन्तु इसमें मुकुन्द कौशल का 'केरवस' एक सार्थक हस्तक्षेप है. यह निर्विवाद सत्य है कि प्रबुद्ध पाठकों के अनुशीलन एवं कमियों के प्रति ध्यानाकर्षण से ही किसी साहित्य का समग्र अवलोकन हो पाता है. लेखक नें जिस उद्देश्य और संदेश के लिए यह उपन्यास लिखा है उसका विश्लेषण आगे आने वाले दिनों में पाठक और आलोचक अपने अपने अनुसार से करेंगें। किन्तु इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आगे यह उपन्यास छत्तीसगढ़ी साहित्य में अपनी एक अलग पहचान प्रस्तुत करेगा. छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी से प्रेम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह उपन्यास अनिवार्यता की सीमा तक आवश्‍यक प्रतीत होता है।

शताक्षी प्रकाशन, रायपुर से प्रकाशित इस उपन्यास का कलेवर आकर्षक है. 112 पष्टों के इस हार्डबाउंड उपन्यास की कीमत 250 रूपया है.

संजीव तिवारी

मन पखेरू उड़ चला फिर : सफर का आगाज़

कविता की शास्‍त्रीय परिभाषा क्‍या है यह मैं नहीं जानता किन्‍तु मेरा यह मानना है कि भावनाओं की अभिव्‍यक्ति जब शब्‍दों में व्‍यक्‍त होती है तो निश्चित तौर पर वह कविता होती है. मानव मन में भावनाओं का विशाल समुद्र लहराता है, उसकी उत्‍तुंग लहरें किसी ना किसी माध्‍यम से बाहर अभिव्‍यक्‍त होती है. सुनीता शानू की भावनायें भी इसी प्रकार बाहर निकल कर शब्‍दों का रूप धरने को छटपटाती नजर आती हैं. उनकी नव प्रकाशित कविता संग्रह ‘मन पखेरू उड़ चला फिर’ इन्‍हीं कविताओं की सुगंधित माला है जिसमें सुनीता शानू की अविरल भावनायें कविता के रूप में व्‍यक्‍त हुई है.

इस कविता संग्रह के संबंध में आलोचक व कवि आनंद कृष्‍ण नें अपनी भूमिका में शास्‍त्रीय विवेचना की है. आनंद कृष्‍ण के शब्‍दों में सुनीता शानू की कवितायें विस्‍तृत हुई हैं, कविता में स्‍पष्‍ट दृष्टिगोचर भाव के अतिरिक्‍त विशिष्‍ठ भाव उद्घाटित हुए हैं. आनंद कृष्‍ण नें सुनीता शानू की कविताओं को रिसते पीड़ा, गूंजते चीत्‍कारों और जीजिविषा के मधुरतम गान का संयुक्‍त समुच्‍चय कहा है. आनंद कृष्‍ण नें संग्रह की लगभग प्रत्‍येक कविता का आलोचनात्‍मक विश्‍लेषण किया है और ख्‍यात विदेशी रचनाकारों के समकक्ष सुनीता शानू को खड़ा किया है. विदित हुआ है कि संग्रह के भव्‍य एवं गरिमाय विमोचन समारोह में भी आनंद कृष्‍ण नें अपने सारगर्भित वक्‍तव्‍य में संग्रह पर अपनी दृष्टि प्रस्‍तुत की है, हालांकि पारिवारिक परेशानियों की वजह से मैं इस समारोह का हिस्‍सा नहीं बन पाया. समारोह में ओम निश्‍चल जैसे कविता के निठुर आलोचक की उपस्थिति संग्रह को कविता की कसौटी में खरे होने का स्‍वमेव प्रमाण पत्र प्रदान करती है.

सुनीता शानू की कविताओं के संबंध में दो शब्‍द भी लिखना हमारे जैसे साहित्‍य के अल्‍पज्ञों के बस की बात नहीं है. ऐसे संग्रह के संबध में जिसका मंगलाचरण आनंद कृष्‍ण जी कर रहे हों और स्‍वति वाचन ओम निश्‍चल, देवी नागरानी, सिद्धेश्‍वर और ललित शर्मा जैसे लोग कर रहे हों. उस पर लिख पाना आसान नहीं है. फिर भी इस प्रयास के पीछे कुछेक कारण है पहला यह कि जो पीड़ा, जीजिविषा उनकी कविताओं में उभर कर सामने आती हैं, लगता है उन सबको हम भी अभिव्‍यक्‍त करना चाहते रहे हैं. दूसरा यह कि लगता है कविताओं में शब्‍द तो सुनीता शानू के हैं किन्‍तु भाव हमारे हैं. मूल यह कि उनकी कवितायें अपनी सी लगती हैं. किन्‍तु मानस में यह प्रश्‍न उभरता है कि अपनी सी लगने वाली सुनीता शानू की कविताओं को कोई दूसरा क्‍यूं नहीं लिख पाया. इसका कारण संभवत: सुनीता शानू के पास हमारे जैसी भावनाओं के साथ ही उनकी स्‍वयं की अद्भुत मानवीय संवेदना है. उनकी कविताओं में रची बसी यही मानवीय संवेदना उनकी कविताओं को दूसरों से अलग करती हैं और एक अलग विशिष्‍ठ स्‍थान प्रदान करती है.

जिन्‍दगी में कामनाओं को बॉंध पाना असंभव है, संयम की दीवार बार बार टूटती है. जब वह टूटती है तो ऑंसुओं की धार के रूप में प्रकट होती है. यह धार तन को तो शीतल करती है किन्‍तु यह शीतलता तन के तापों की नई भाषा भी गढ़ती है और सुनीता शानू की कविता के रूप में कुछ इस तरह बहती है - ’’कामना का बॉंध टूटा / ग्रंथियॉं भी खुल गई. / मलिनता सारी हृदय की / ऑंसुओं से धुल गई. / एक नई भाषा बना ली / तन के शीतल ताप नें.

सुनीता शानू की संवेदनायें जब नई भाषा के रूप में प्रकट होती है तो चमकृत कर देने वाले बिम्‍ब भी उभरते हैं. कहीं वह विश्‍वास को आटे में गूंथा हुआ कहती है तो कहीं मन के ऑंगन की माटी को अरमानों की बीज सौंपती है. बेहिसाब यादों का हिसाब रखती है तो यादों की स्‍याही से खत लिखती है. वह सभी को मुस्‍कुराहटों का खजाना बांटना चाहती है. बच्‍चों सी सहज सरल रूप में कच्‍ची इमली की कसम निच्‍छल भाव से देती है. मुखर प्रेम और प्रेम से उपजे अशांत पीड़ाओं को हृदय गव्‍हर में पालती है. समय के तुकड़ों को समेटे हुए मौन में भी गीत गाती है. उसका मन बंद पिंजड़े में पंछी सा फड़फड़ाता है और जब शब्‍द के सहयोग से द्वार खुलते हैं तब मन पखेरू उड़ चलता है फिर.

दर्द, संघर्ष और आस हर पंक्तियों में छटपटाते हैं. सिमटती चेतनायें, धैर्य को सहेज नहीं पाती और इन्‍हीं छटपटाहटों में गीत फूट पड़ते हैं. ‘कामवाली’ व अन्‍य कविताओं में खामोशियॉं रोती है और लहरे भी मौन हो जाते हैं. संवेदनायें मानवता की आंच में मोम बनकर पिघलनें लगते हैं और शब्‍द सीधे हृदय में वार करते हैं. सूफियाना अंदाज में ईश्‍वर को कहीं प्रेमी तो कहीं कृष्‍ण सखा के रूप में कविताओं का संबोधन पाठक को आध्‍यात्मिक प्रेम का पाठ पढ़ाती हैं. ईश्‍वर से दुख, सुख बांटती कविताओं में प्रेम, अभिसार, अपेक्षा, शिकायत के साथ ही विश्‍वास का भाव सुनीता शानू के हौसले का चित्र खींचती है - कर ही लूंगी पार / पूरा आकाश / पा ही लूंगी / मेरा सपना.

जनवादियों की तरह सुनीता शानू सड़ चुके उसूलों और दायरों को बंधन मानती है. वह सोंचती है कि यही वह बेडि़यॉं है जो मन के उड़ान को भी रोक‍ती हैं. वह उन्‍मुक्‍त गगन में उड़ना चाहती है. उसकी कवितायें स्‍वप्‍नों की बगिया से शाश्‍वत की पथरीली धरातल तक का अंतहीन सफर करती है. इस सफर में उसका गजब का आत्‍मविश्‍वास ही उसका संबल है, यह उसके आत्‍म कथ्‍य में ही झलकता है यथा ‘ये जिन्‍दगी एक खूबसूरत कविता है और मैं इसे जी भर के जीना चाहती हूं.’

इस संग्रह के प्रकाशन के लिए सुनीता शानू को हार्दिक शुभकामनायें. हम आशा करते हैं कि कविता के क्षेत्र में वे निरंतर उन्‍नति का शिखर प्राप्‍त करेंगी और इससे भी उत्‍कृष्‍ठ एवं परिपक्‍व रचनायें हिन्‍दी साहित्‍य को प्राप्‍त होगीं.   

संजीव तिवारी
कृति का नाम : मन पखेरू उड़ चला फिर
विधा : कविता
रचनाकार : सुनीता शानू
प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली
पृष्ठ : 127;
मूल्य : 195 रु.

छत्‍तीसगढ़ी महागाथा : तुँहर जाए ले गिंयॉं

छत्‍तीसगढ़ी गद्य लेखन में तेजी के साथ ही छत्‍तीसगढ़ी में अब लगातार उपन्‍यास लिखे जा रहे हैं। ज्ञात छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यासों की संख्‍या अब तीस को छू चुकी है। राज्‍य भाषा का दर्जा मिलने के बाद से छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य की खोज परख में भी तेजी आई है। इसी क्रम में कोरबा के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार कामश्‍वर पाण्‍डेय जी के द्वारा रचित छत्‍तीसगढ़ी महागाथा ‘तुँहर जाए ले गींयॉं’ को पढ़ने का अवसर मुझे प्राप्‍त हुआ। वर्तमान छत्‍तीसगढ़ के गॉंवों में व्‍याप्‍त समस्‍याओं, वहॉं के रहवासियों की परेशानियों एवं गॉंवों से प्रतिवर्ष हो रहे पयालन की पीड़ा का चित्रण इस उपन्‍यास में किया गया है। आधुनिक समय में भी जमीदारों के द्वारा गॉंवों में कमजोरों के उपर किए जा रहे अत्‍याचार को भी इस उपन्‍यास में दर्शाया गया है। इस अत्‍याचार और शोषण के विरूद्ध उठ खड़े होनें वाले पात्रों नें उपन्‍यास को गति दी है। विकास के नाम पर अंधाधुध खनिज दोहन से बढ़ते पर्यावरणीय खतरे के प्रति आगाह करता यह उपन्‍यास नव छत्‍तीसगढ़ के उत्‍स का संदेश लेकर आया है।

उपन्‍यास की भूमिका के पहले पैरे पर डॉ.विनय कुमार पाठक नें उपन्‍यास के संबंध में जो कुछ कहा है उसके बाद कुछ और बातें कहने को शेष नहीं रह जाती, फिर भी एक पाठक के रूप में इस उपन्‍यास को पढ़ने पर हुई अनुभूति को बांटनें का लोभ हम संवरण नहीं कर पा रहे हैं। हो सकता है कि उपन्‍यास पर लिखते हुए आगे के पैराग्राफों में स्‍वयंभू आलोचक होने की गलतफहमी भी मानस के किसी कोने में दुबका हो। किन्‍तु उपन्‍यास को पढ़ते हुए जलेबी खाने सा उल्‍लास मन में रहा है, सो उसे आप सब को बांट रहा हूँ।

नये नवेले इस प्रदेश में जिस तेजी से औद्यौगीकरण हुआ है और इस रत्‍नगर्भा धरती के दोहन के लिए नैतिक अनैतिक प्रयास हुए हैं वह किसी से छुपा नहीं है। इसका प्रत्‍यक्ष प्रभाव छत्‍तीसगढ़ के गॉंवों पर पढ़ा है, किसानों की भूमि जबरिया भूमि अधिग्रहण के द्वारा छीनी जा रही है। बची खुची धरती अंधाधुंध औद्यौगीकरण और खनिजों के दोहन से निकले धूल और जहरीली गाद से पट चुकी है या प्रदूषित हो रही है। पर्यावरण का भयावह खतरा चारो तरफ नजर आ रहा है किन्‍तु उसकी परवाह किए बिना षडयंत्र के तहत गॉंव पे गॉंव खाली कराए जा रहे हैं, कृषि जमीनों में उद्योग लगाए जा रहे हैं। उपन्‍यासकार नें इस उपन्‍यास में अन्‍य सामयिक समस्‍याओं के साथ ही पर्यावरण के इसी बढ़ते खतरे पर पाठकों का ध्‍यान आकर्षित कराया है।

उपन्‍यास की भाषा मेरी जानी पहचानी है, खाल्‍हे राज में बोली जाने वाली यह छत्‍तीसगढ़ी मैदानी छत्‍तीसगढ़ी से ज्‍यादा मधुर है एवं हमें बेहद प्रिय है। जॉंजगीर, अकलतरा, बलौदा, शिवरीनारायण अंचल में छुट्टियॉं बिताते, रिश्‍तेदारी में आते जाते इस मधुर छत्‍तीसगढ़ी का रसास्‍वादन हम करते रहे हैं। यह निर्विवाद सत्‍य है कि असल मायने में छत्‍तीसगढ़ी भाषा का ‘गुरतुर’ रूप इन्‍हीं अंचलों में बोली जाती है। उपन्‍यास इसी अंचल की बोली में होने के कारण हमें इसकी भाषा बहुत प्रिय लगी। उपन्‍यास में भाषा के प्रयोग में अंग्रेजी व अन्‍य दूसरी भाषाओं के शब्‍दों के प्रयोग से छत्‍तीसगढ़ी और जीवंत, सरल एवं बोधगम्‍य हो गई है। उपन्‍यास में देसज ठेठ शब्‍दों के प्रयोग नें नागरी छत्‍तीसगढ़ी के शब्‍द सामर्थ्‍य को बढ़ाया है। कामेश्‍वर भाई नें कई ऐसे ठेठ शब्‍दों का प्रयोग किया है जिनके अर्थ के लिए आम छत्‍तीसगढ़ी भाषा भाषी को भी बगलें झांकना पड़ जाए। कुछ शब्‍द देखें – रम्‍पई पेड, धीकुडिया, कगरियाना, पधराए, अकरखन, बेरा ओहरत, बकठी बहुरिया, नेंगुर, दहिंगला, पपरेल गाछ, पतघबड़ा, कर-नर, गमेरय, बिझुक्‍के – बिझुक्‍का, बुधियार, अतमैती आदि। उपन्‍यास में मुहावरों, लोकोक्तियों एवं कहावतों का भी प्रयोग रूचिकर लगा जिनमें – ‘बिटौना के बादर छा गईस’, ‘आन के खॉंड़ा आन के फरी खेदू नाचय बोईर तरी’, दॉंदर कस डउकी के मॉंदर कस पेट लइका होवाइस त हँसिया कस बेंठ’ आदि।

उपन्‍यास में प्रतीकों और घटनाक्रमों को विश्‍लेषित करने का ढंग निराला है। उपन्‍यासकार नें प्रतीकों, बिम्‍बों और भाषा पर सिद्धस्‍थ चित्रकार की तरह शब्‍द चित्र खींचा है। कुछ उदाहरण देखिये – ‘...... गंगाराम मन के कुकरी घर ले अपन चिंयॉं मन ला ले के कोरकिर – कोरकिर निकलिस अउ ओमन ल गली ल छुवा के फेर घुसर गइस। ओखर ऑंट म बइठे सेरू केकती मन ला देख के गुर्राए बर मूँ बनाइस, लेकिन फेर अपन बिचार ल तियाग के अपन हँफराई उपर चेत करिस। ओहू ल तो गरमी ल पार पाए बर परथे।‘, यह मात्र कल्‍पना नहीं है यह अनुभव का चित्रण है। इसी प्रकार ‘ .... औखरहा आभा-बोली मन ओकर कान मं मछेव कस भन्‍नावत रथे।‘ यह वही लिख सकेगा जिसनें मधुमखियों को भनभनाते सुना होगा। कोसा कीड़ा और केकती के जीवन पर पृष्‍ट 344 में भी उपन्‍यासकार नें बहुत मार्मिक व भावनात्‍मक स्थिति का उल्‍लेख किया है, आदि।

उपन्‍यासकार नें उपन्‍यास में चुटीले व्‍यंग्‍य का भी प्रयोग किया है जो कहीं गुदगुदाता है तो कहीं अंतस तक भेदता है, देखें – ‘मस्‍टर रोल मं भूत-परेत तक मन के नाव चढ़थे। सरकार के बाप नइ पुरोए सकै।‘ व ‘... लेकिन सरकार ल बाबा गुरू घसीदास के जैत-खाम ल कुतुब मीनार ले उँच बनवाए बर परते तो हे। भले एमा बोट के खोट हे, लेकिन हावै तो न।‘, ‘.... बंजर मं भटके-गँवाए सुरेन कभू सोचे नइ रहिस, एक दिन ए जंगले हर गँवा जाही।‘

उपन्‍यास में खण्‍ड- खण्‍ड कहानियॉं आगे बढ़ती हैं और संवेदना का एक सम्मिलित रूप उभर कर सामने आता है। लगभग दो दर्जन पात्रों के साथ आगे बढ़ती कहानी में उपन्‍यासकार नें सभी पात्रों का चरित्र चित्रण बहुत सहज व सरल रूप से प्रस्‍तुत किया है। संवादों के सहारे पात्रों के व्‍यक्तित्‍व को स्‍पष्‍ट भी किया है। उपन्‍यास में बड़े कका, सिवप्रसाद, चुनिया, होरी, लहाराम, पैसहा आदि के चरित्रों का व्‍यक्तित्‍व स्‍वयं बोलता है। कहानी में नाटकीयता, रोचकता, पात्रों की भावनाओं की अभिव्‍यक्ति, चुटीले व प्रभावकारी संवाद उपन्‍यास को रोचक बनाते हैं।

गॉंव में आयोजित भोज के समय पर दो विरोधाभाषी तथ्‍य सामने आते हैं जो संभवत: उपन्‍यासकार के लेखन को पुराना बताता है तो वहीं उसके संपादन को नया सिद्ध करता है। भोज के लिए रसोई बनाने में सहयोग करती महिला गुडाखू पचास पैसे में मंगाती है और आगे इसी अध्‍याय में नारियल दस रूपये में खरीदने का उल्‍लेख होता है। यह दर्शाता है कि उपन्‍यासकार नें अपने लेखन को बार-बार पढ़ा है और समयनुसार आवश्‍यक संशोधन भी किया है। 

कामेश्‍वर पाण्‍डेय लिखित उपन्‍यास ‘तुँहर जाए ले गिंयॉं’ छत्‍तीसगढ़ के एक गॉंव की कहानी है। इसमें बड़े कका के नायकत्‍व में विभिन्‍न कहांनियॉं उनके इर्द गिर्द घूमती हैं। गॉंव में पैसहा ठाकुर (विसाल) उसके बेटे राजा, घनश्‍याम, बल्‍लू और छुट्टन का अत्‍याचार है। उपन्‍यास का आरंभ पलायन कर गए मजदूर भगेला के गॉंव आने के वाकये से होता है। भगेला और गॉंव के मजदूर मुरादाबाद के इंट भट्टे में कमाने खाने जाते हैं और इंट भट्टा का मालिक व उनके गुर्गे उन्‍हें बंधुवा बना लेते हैं। वहॉं से भगेला भाग कर गॉंव आता है, बड़े कका और सिवकुमार भगेला को सहयोग करते हैं और जॉंजगीर के किसोर की संस्‍था के स्‍वयंसेवक होरी के प्रयास से सभी मजदूर छूट कर गांव के लिए रेल से निकल पड़ते हैं। उनके आने की खुशी में गॉंव में रामायण का कार्यक्रम रखा जाता है जिसमें गॉंव के सभी लोग भेद भाव जात पात भूलकर एक साथ भोजन करते हैं। 

इन घटनाओं के बीच में पैसहा ठाकुर की बेटी की प्रेम गाथा भी आकार लेती है। केकती गॉंव के ही गरीब मजदूर कौशल से प्‍यार करती है, उसके प्‍यार के रास्‍ते में उसके भाई रोड़े अटकाते हैं और कौशल को प्रताडि़त करते हैं। पैसहा परिवार के जुल्‍म से कौशल को गॉंव छोड़कर भागना पड़ता है और वह कमाने खाने काश्‍मीर चला जाता है। वहॉं उसके प्रेम के डोर को पत्रों के माध्‍यम से केकती की सहेली सुकवारो कायम रखती है। सुकवारा गॉंव की स्‍वयंसिद्धा महिला है, वह दुर्गा महिला मण्‍डल की अध्‍यक्षा है और गॉंव के कोसा पालन केन्‍द्र में मण्‍डल की महिलाओं के साथ काम करती है। सुकवारा के पति भी कौशल के साथ काश्‍मीर में काम करता है उसी के सहारे कौशल की पाती केकती तक पहुचती है। 

उपन्‍यास में कथा उपकथा रोचकता को बढ़ाती है और कथानक आगे बढ़ता है। बड़े कका के घर रह रही चुनिया बड़े कका के नौकर लहाराम की पुत्री है। चुनिया विधवा है, लहाराम उसके दुख को देखकर उसे उसके ससुराल से अपने घर ले आता है किन्‍तु लहाराम की दूसरी पत्‍नी चुनिया को दुख देती है। गॉंव में फैले पैसहा के बेटों का आतंक और चुनिया के दुख को देखते हुए लहाराम बड़े कका से अनुरोध करता है और बड़ी काकी चुनिया को अपने घर ले आती है। चुनिया अपने सारे दुखों को भूलकर वृद्ध कका काकी की सेवा करती है। बड़े कका का परिवार चुनिया को सामाजिक सुरक्षा ही नहीं वरन उसे अपने घर की बेटी बनाकर रखते हैं। उपन्‍यास का बंधुआ मजदूरों का मुक्तिदूत होरी भी विधुर है, चुनिया की ऑंखें उससे दो चार होती है और उन दोनों की स्‍वीकृति से कथा के बीच में ही वे वैवाहिक जीवन में बंध जाते हैं। 

कथा में बड़े कका का पुत्र सुरेन, जो शहर में नौकरी करता है अपने मित्र संदीप भट्टाचार्य के साथ गॉंव आता हैं। महानगर में पले बढ़े संदीप भट्टाचार्य को गॉंव का यह माहौल अटपटा लगता है, वे दोनों गॉंव के बदलते हालातों से दो चार होते हैं। सदियों से चली आ रही परम्‍परा के अनुसार गॉंव में बद्रीनाथ केदारनाथ से बड़े कका के घर पातीराम पण्‍डा व उसका भतीजा मन्‍नू भी आता है और कुछ दिन रूक कर गॉंव में घूमकर दान प्राप्‍त करता है। पातीराम के साथ आए मन्‍नू की कुदृष्टि का चुनिया बेखौफ जवाब देती है तो एक और परित्‍यक्‍ता लड़की फंस जाती है। बात आगे बढ़ती उसके पहले ही लड़की को भूत चढ़ने का वाकया होता है और मन्‍नू के मन में घर कर गए भय से लड़की बच जाती है। 

मूल कथा क्रम में पैसहा गॉंव में सदियों से निस्‍तार हेतु प्रयुक्‍त रास्‍ते को कांटे से घिरवा देता है क्‍योंकि वह रास्‍ता राजस्‍व अभिलेख में उसके नाम पर होता है। यहीं से गॉंव वालों का विरोध आकार लेता है। रास्‍ते को घिरवाना पैसहा व उसके चम्‍मचों का चाल होता है। पैसहा चाहता है कि गॉंव में डायमण्‍ड कोल वासरी खुले जिसके लिए गॉंव वाले बावा डिपरा की जमीन कोल वासरी को स्‍वेच्‍छा से दे दें। पैसहा कोल वासरी में ठेके और अपने ट्रकों को काम मिलने से अपने लाभ की सोंच रहा है उसे गॉंव के किसानों या पर्यावरण से कोई लेना देना नहीं है। वह चाहता है कि गॉंव वाले अपनी जमीन कोल वासरी को दे दें तो वह गॉंव के निस्‍तारी रास्‍ते को खोल देगा। पैसहा के इस काम में सहयोग गॉंव का सरपंच बजरंग, पाण्‍डे और कोलवासरी का मैनेजर डी.के.चौहान आदि करते हैं। रास्‍ता खोलने हेतु गॉंव में पंचायत बुलाई जाती है। पैसहा अपनी र्शत रखता है, मुकुंदा और दूसरे गॉंव वाले इसका विरोध करते हैं खासकर वे जिनका जमीन बावा डिपरा में है। पैसहा के बेटे प्रतिरोध को दबाना चाहते हैं इसी क्रम में लालदास की पैसहा के बेटों से पंचायत के बीच में ही लड़ाई हो जाती है। राजा कट्टा निकाल लेता है और चलाने ही वाला होता है कि बरसों से दबे कुचले दलित व अपंग पंचराम के शरीर में अचानक बल का संचार होता है और वह राजा के कलाई में डंडे से भरपूर वार करता है। अनहोनी टल जाती है और जैसे तैसे लड़ाई को शांत किया जाता है। पंचायत बिना फैसले के उठ जाती है। 

लड़ाई की आग गॉंव में धीरे धीरे सुलगने लगती है। पैसहा की जिजीविषा और उसके बेटों के आतंक में कोई कमी नहीं आती। राजा के द्वारा गॉंव की बहु बेटियों के बलत्‍कार के कई किस्‍से हरफों में उभरते हैं और शोषितों की आवाज दमन के डंडों में दब जाती है। गॉंव के बहु बेटियों की जुबान में टीस बाहर निकलने के लिए छटपटाती है किन्‍तु लोकलाज व राक्षसों के दबंगई के कारण दबी रह जाती है।

राजा ना केवल गॉंव की इज्‍जत से खेलता है बल्कि अपने दुश्‍मनों को रास्‍ते से हटाने में भी गुरेज नहीं करता। वह पंचराम की हत्‍या करता है और परिस्थितिजन्‍य साक्ष्‍य के बावजूद उस पर कोई आंच नहीं आती। ऐसी ही घटना का शिकार पूर्व में गोरे पंडित भी होता है, दोनों की हत्‍या को आत्‍महत्‍या सिद्ध कर दिया जाता है।

ऐसे ही दिनों में जब राजा के हवस का शिकार हुई बेदिन के पति को दमन की पीड़ा सहन नहीं होती तो वह हिम्‍मत बॉंध कर पैसहा को ललकार उठता है। बढ़ते उम्र के कारण पैसहा क्रोध में उसे मारने दौड़ता है किन्‍तु पांव में पत्‍थर लगने से गिर जाता है। ललकारने वालों के सर पर बेवजह संकट आ जाती है किन्‍तु किसी भी तरह पैसहा को उसके घर पहुचाया जाता है वहां से अस्‍पताल। लाखों खर्च करने पर भी पैसहा ठीक नहीं होता और असक्‍त होकर बिस्‍तर में पड़ जाता है। बेटे मनमानी करने लगते हैं और गॉंव को नियंत्रित नहीं कर पाने का दुख पैसहा सालता है, अंतिम समय में वह प्रायश्चित करने का जुगत करता है।

पैसहा के बेटे डायमण्‍ड कोल वासरी को अपने आतंक से विस्‍तार देते हैं। राजा की अय्यासी बढ़ते जाती है, एक दिन तालाब में अकेले नहाते बेदिन पर फिर उसकी नीयत डोल जाती है। वह बेदिन का पीछा करते उसके घर तक आ जाता है और उसे घर में अकेली पाकर उसका बलात्‍कार करने पर उतारू होता है उसी समय ताक में बैठे बेदिन का पति उसे मार डालता है। राजा को मारने के बाद वह उत्‍साह के साथ गॉंव में इसका एलान करता है व जूलूस के साथ थाने जाकर सरेंडर करता है। 
बड़े कका और सिवप्रसाद के संयुक्‍त प्रयास से गॉंव धीरे धीरे जागने लगता है। कोलवासरी के विस्‍तार एवं पैसहा के बेटों के दमन का विरोध करना गॉंव वाले सीखने लगते हैं। किन्‍तु पैसहा जैसे लोगों के पूर्व स्‍वार्थपरक कूटनीतिक चालों के कारण कोलवासरी और ओपन कोल माइंस का दंश गांव वालों को झेलना पड़ता है। जनसुनवाई में जनता विरोध में सर उठाती है किन्‍तु प्रशासन कोलवासरी को विकास मानते हुए जमीनों को लीलना चाहती है।

बड़े कका और सिवप्रसाद उपन्‍यास में कुरीतियों को सहजता से दूर करने की शिक्षा देते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। कुष्‍ट, टोनही, भूत आदि के संबंध में व्‍याप्‍त अंधविश्‍वास की वे वैज्ञानिक व्‍याख्‍या करते हुए जनता के मन से उसका भय दूर करते हैं। अपने प्रेमी की बाट जोहती केकती सपने में देखती है कि उसका प्रेमी कौशल अनंतनाग में राजमिस्‍त्री का काम करते हुए उपर से गिर जाता है और मर जाता है। उसका स्‍वप्‍न वास्‍तव में सत्‍य होता है। अनंतनाग में कौशल आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो जाता है। प्रेमी की मौत की खबर से केकती पागल हो जाती है। कथा के अंत में कौशल खाइन पान में महागाथा की वेदना फूटती है। केकती पान ठेले में अपने प्रेमी के पसंद का पान मागती है, पान खाकर वह हसती है, उसकी हंसी गांव में गूंजती है। बड़े कका के घर में बच्‍चों का व्रत व पर्यावरण रक्षा का व्रत खम्‍हरछट के पूजा का आयोजन हो रहा है, कथा कही जा रही है। पर्यावरण बचाने गांव वाले अब उठ खड़े होंगें इसी आशा में गाथा समाप्‍त होती हैं।

उपन्‍यास में बंधुआ मजदूरी के समय एक बच्‍ची के बलत्‍कार की कहानी और उस अबोध बच्‍ची के गर्भवती होने की कहानी, होरी के बंधुआ मजदूरी से भागने का वाकया, भोजन भट्टों की कहानी, कुष्‍ट होने पर समाज को बोकरा भात देने की परम्‍परा का विरोध, भूत चढ़ने उतारने का चित्रण, सांप काटने पर परिवहन की समस्‍या के कारण लोगों की मौत का वाकया, ग्‍वाले के बेटों के द्वारा दूध में बंबूल के बीज को पीसकर मिलाने की घटना को देखकर साधू हो जाना आदि का संवेदनात्‍मक चित्रण उपन्‍यासकार नें किया है। 

अब तक पढ़े गए छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यासों में यह उपन्‍यास हमें सर्वश्रेष्‍ठ लगी। यह उपन्‍यास सचमुच में अपनी संपूर्णता के साथ प्रस्‍तुत हुई है। लेखक का इसे महागाथा कहना, पढ़ने से पहले अटपटा लग रहा था। किन्‍तु इसे पढ़ते हुए कथाओं की लयात्‍मकता और घटनाओं के प्रवाह से एक रागिनी फुटती हुई महसूस होती है। यही रागिनी इसे स्‍वमेव महागाथा सिद्ध करती है। छत्‍तीसगढ़ी भाषा में इतनी उत्‍कृष्‍ट रचना प्रस्‍तुत करने के लिए भाई कामेश्‍वर पाण्‍डेय जी को बहुत बहुत धन्‍यवाद।

संजीव तिवारी
तुँहर जाए ले गींयॉं
(छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास)
लेखक : कामेश्‍वर पाण्‍डेय
पृष्‍ट संख्‍या : 420

मूल्‍य : सजिल्‍द 400/- 
प्रकाशक : सर्वप्रिय प्रकाशन
1569, प्रथम मंजिल, चर्च रोड
काश्‍मीरी गेट, दिल्‍ली 110006
वितरक : वैभव प्रकाशन
सागर प्रिटर्स के पास, अमीनपारा चौंक
पुरानी बस्‍ती, रायपुर (छत्‍तीसगढ़)
फोन : 0771 4038958, 09425358748


छत्‍तीसगढ़ी प्रशासनिक शब्‍दकोश : खुली चर्चा होनी चाहिए

विधान सभा द्वारा तैयार एवं राजभाषा आयोग द्वारा प्रकाशित छत्तीसगढ़ी प्रशासनिक शब्दकोश पर उठते सवाल नें प्रत्येक छत्तीसगढिया के कान खडे कर दिये हैं. मीडिया में उडती खबरें यह बता रही है कि इसमें संकलित कई शब्दों के अर्थ ग्राह्य नहीं हैं. किसी भी ग्रंथ पर कुछ लिखने के पहले उसका अवलोकन व अध्ययन आवश्यक है इस लिहाज से यह प्रशासनिक शब्दकोश हमारे पास अभी नहीं है किन्तु माध्यमों से जो शब्दार्थ सामने आ रहे हैं उससे प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि शब्दकोश जल्दबाजी में छाप दी गई है.

ऐसे समय में जब छत्तीसगढ़ी राजभाषा के मानकीकरण एवं शब्दों के दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर सभी विद्वान बल दे रहे है उसी समय में राजभाषा विभाग द्वारा यह प्रशासनिक शव्दावली प्रकाशित की गई है और आगे की कड़ियों के प्रकाशन की योजना भी है. आरम्भिक कड़ी में ही गलतियां सामने आ रही है इसलिए पहले यह आवश्यक है कि इस पर प्रदेश स्तरीय विमर्श हो. समाचार पत्रों में इसमें संकलित शब्दों के संबंध में जो समाचार आ रहे है उसको देखते हुए और इस शब्दकोश के निर्माण की प्रक्रिया के संबंध में पढते हुए, यह तो स्पष्ट है कि इन दोनों में सुधार की आवश्यकता है.

यह निर्विवाद सत्य है कि कोई भी शब्दकोश पूर्ण नहीं माना जा सकता, सुधार की संभावना सदैव बनी रहती है किन्तु राजभाषा आयोग के द्वारा प्रकाशित किए जाने के कारण जन की अपेक्षा इस शब्दकोश से बहुत थी. इसके पूर्व भी वरिष्ठ विद्वानों के द्वारा कुछ मानक छत्तीसगढी शब्दकोश प्रकाशित किए जा चुके हैं जिस पर अलग अलग राय लोगों का रहा है किन्तु वे शब्दकोश व्यक्ति विशेष द्वारा लिखे गए थे और प्रकाशक भाषा आयोग नहीं था ना ही उन्हें प्रशासकीय दस्तावेज बनाने की घोषणा हुई थी इसलिये उन पर चर्चा उतनी आवश्यक नहीं थी.

शैक्षणिक अनुसंधान परिषद के द्वारा प्रकाशित शब्दकोश पर तदकालीन मीडिया नें लगातार समचार छापे थे एवं उस पर विमर्श भी हुआ था. शैक्षणिक अनुसंधान परिषद के शब्दकोश बनाने में सहभागिता करने वाले विद्वानों नें विनम्रता से इसे स्वीकारा भी था कि यद्धपि सुधार की संभावना नाममात्र है किन्तु इस पर प्रयास किया जा सकता है. सुधार की संभावनाओं को कम करने एवं उस पर विश्वास करने के पीछे शैक्षणिक अनुसंधान परिषद के द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया भी थी. शैक्षणिक अनुसंधान परिषद नें ये शब्दकोश छ: महीनों के लगातार अलग अलग भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी के जानकार लोगों के बीच प्रत्येक शब्द पर बहस कर के अंगीकार किया गया था.

छत्तीसगढी के राजभाषा बनने के बाद प्रशासनिक शब्दावली की आवश्यकता तो बढ गई थी किन्तु इसके लिए क्रमबद्ध तैयारी की आवश्यकता थी. विधानसभा के द्वारा शब्दावली तैयार करने उसे अनुमोदित करने के लिए जिन जिन विद्वानों नें कार्य किया उनकी भाषा संबंधी ज्ञान पर कोई भी प्रश्न चिन्ह नहीं है किन्तु विधानसभा या आयोग को इसे तैयार करने के लिए छत्तीसगढ़ी के साथ साथ गोडी, भथरी, सरगुजिहा, लरिया आदि के अधिकाधिक जानकारों का सहयोग लेना था. दोनों संस्थानों की विश्वसनीयता इस शब्दकोश का आधार है, यदि वर्तमान में प्रकाशित कोश में सुधार नहीं किया जाता तो यह माना जायेगा कि इसमें संकलित, कुछ विरोध किए जा रहे शब्दों को मानक बनाने के लिए थोपा जा रहा है.

भाषा विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार शब्द संकलन प्रक्रिया निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, इसी का परिपक्व सोपान मानकीकरण होता है. प्रकाशित प्रशासनिक शब्दावली को मानक कदापि ना माना जावे, अभी मानकीकरण का सफर लम्बा है.

यदि सरकार की इच्छा इमानदारी से छत्तीसगढ़ी प्रशासनिक शब्दकोश प्रकाशित करने की है तो आयोग के दिशानिर्देशन में प्रत्येक छत्तीसगढ़ी शब्द के अर्थ और प्रयोग पर अलग—अलग विद्वानों से ओपन डिबेट होना चाहिए और इसका दस्तावेजीकरण होना चाहिए, इस कार्य के लिए यद्धपि लम्बा समय लगेगा किन्तु इसी से शब्दों के मानक अर्थ र्निविवाद स्थापित होंगें. इससे 'नंदाते' शब्दों का दस्तावेजीकरण भी हो पायेगा, हमारे बहुत सारे शब्दों का प्रयोग अब नहीं हो रहा है, फिर भी यदा कदा वे शब्द प्रयोग होते हैं उनका अर्थ भी ऐसे शब्दकोश में आ पायेगा. आक्शफोर्ड डिक्शनरी के द्वारा कोश निर्माण के लिए जिस तरह से भाषा विशेषज्ञों के सहयोग के साथ ही समय समय पर समाज से वार्ता की जाती है उसी तरह से हमारे प्रशासनिक शब्दकोश के लिए भी समाज से खुली चर्चा होनी चाहिए.

गैर छत्तीसगढ़ी भाषी के लिए शब्दों का आधा अधूरा ज्ञान किस तरह संवेदनशील हो जाता हैं इसका एक उदाहरण देखिये. एक गैर छत्तीसगढ़ी भाषी व्यापारी को किसी नें बतलाया था कि पुरूष को 'डउका' और स्त्री को 'डउकी' कहा जाता है. उस व्यापारी के मृदुल स्वर में 'ए वो डउकी! ले जा ना वो दस रूपया म!' कहते ही उसके पीठ में जोरदार डंडा उस स्त्री के पति द्वारा जड़े गए और फिर उसकी जमकर धुनाई हुई. शब्दों के अर्थ एवं उसके प्रयोगों के प्रति यदि हम संवेदनशील होकर गैर छत्तीसगढ़ी भाषी को नहीं समझायेंगें तो यही होगा.

संजीव तिवारी
संपादक : आनलाईन छत्तीसगढ़ी वेब मैग्जीन गुरतुर गोठ डॉट कॉम

उदंती डाट काम डॉ. रत्‍ना वर्मा की पत्रिका www.udanti.com पर उपलब्‍ध

'पत्रकारिता की दुनिया में 25 वर्ष से अधिक समय गुजार लेने के बाद मेरे सामने भी एक सवाल उठा कि जिंदगी के इस मोड़ पर आ कर ऐसा क्या रचनात्मक किया जाय जो जिंदा रहने के लिए आवश्यक तो हो ही, साथ ही कुछ मन माफिक काम भी हो जाए। कई वर्षों से एक सपना मन के किसी कोने में दफन था, उसे पूरा करने की हिम्मत अब जाकर आ पाई है। यह हिम्मत दी है मेरे उन शुभचिंतकों ने जो मेरे इस सपने में भागीदार रहे हैं और यह कहते हुए बढ़ावा देते रहे हैं कि दृढ़ निश्चय और सच्ची लगन हो तो सफलता अवश्य मिलती है।' 

यह उदंती डाट काम के संपादक, प्रकाशक व मुद्रक डॉ. रत्‍ना वर्मा के अंतरमन से निकले शव्‍द हैं जिन्‍हें रूपांतरित करने के लिए उन्‍होंनें उदंती डाट काम के आनलाईन और प्रिंट प्रकाशन का निर्णय लिया और  अपने स्‍वप्‍नों को साकार करते हुए विगत दिनों प्रदेश के मुख्‍य मंत्री डॉ. रमन सिंह के करकमलों इस पत्रिका के प्रिंट वर्जन  का  विमोचन करवाया ।
डॉ. रत्‍ना वर्मा जी के इस कार्य को आनलाईन ब्‍लाग प्‍लेटफार्म देनें हेतु हमने सहयोग किया और आरंभिक तौर पर इसे www.udanti.com पर होस्‍ट कर पब्लिश कर दिया । प्रदेश की राजधानी में इस संबंध में आज समाचार प्रकाशित भी हुए हैं, हम ब्‍लागर्स साथियों के लिए इस पत्रिका की लिंक व विषयक्रम यहां प्रस्‍तुत कर रहे हैं :-

अंक 1, अगस्‍त 2008

अनकही :
संपादक की कलम से
पत्रिकायें नियमित अंतराल के बाद हर बार एक नया अंक प्रस्‍तुत करती हुई प्रवाहमान रहती है अत: पत्रिकाओं को रचनात्‍मक विचारों की नदी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी आगे पढे


कृषि /छत्‍तीसगढ :
खुशहाली के इंतजार में धान का कटोरा - चंद्रशेखर साहू

पर्यटन / नीति :
देश के पर्यटन नक्‍शे पर छत्‍तीसगढ कहां है ? - विनोद साव


उदंती :
खूबसूरत गोडेना फॉल - संतोष साव


इंटरनेट / सर्फिंग :
आभासी दुनियां के दीवाने ब्‍लागर्स - संजीव तिवारी

सेवा /स्‍वर्ण जयंती वर्ष :
सृजन का पर्याय भिलाई महिला समाज - ललित कुमार

इतिहास से / खजाना :
ओ मेरे सोना रे, सोना रे . . . - प्रताप सिंह राठौर

बस्‍तर / जीवन शैली :
गोंड जनजाति का विश्‍वविद्यालय घोटुल - हरिहर वैष्‍णव
छोटे परदे की टीआरपी बढाते बडे सितारे - डॉ. महेश परिमल

संस्‍मरण / बचपन के दिन :
सॉंस सॉंस में बसा देहरादून - सूरज प्रकाश


मन की गांठ / आदत :
कृपया क्षमा कीजिए - लोकेन्‍द्र सिंह कोट

कवि गोष्ठियों को ‘’भजन मंडलियॉं’’ मत बनाइये

तुलसीदास : ’’कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कहँ हित होई (वही कीर्ति, रचना तथा सम्‍पत्ति अच्‍छी है, जिससे गंगा नदी के समान सबका हित हो)’’
सम सामयिक चेतना की छंद धर्मी, स्व . रामेश्वर गुरू तथा स्व. विश्वंभर दयाल अग्रवाल पत्रकारिता पुरस्कार प्राप्त मासिक पत्रिका ‘’संकल्प रथ’’ के जुलाई 2008 के संपादकीय में आदरणीय राम अधीर जी वर्तमान परिवेश में देश के गली कूचों पर धडा धड आयोजित होते कवि सम्मेलनों के संबंध में देश के ख्यात कवियों व साहित्य कारों के विचार कि आज के कवि सम्मेलन तो ‘’लाफ्टर शो’’ हो गए हैं, पर कहते हैं - ’’मुझे उनकी बातों से सहमत होना पडता है, किन्तु ऐसी खरी-खोटी टिप्पणी करने वाले ये गीतकार दो कौडी के हास्य कवियों के साथ मंचों पर क्यों बैठते हैं ? इसके पीछे उनकी धन-लोलुपता है । जबकि चुटकुलेबाजी में माहिर और विदेशों तक में जाने वाले कवियों नें हिन्दी कविता को द्रौपदी बनाकर रख दिया है । ऐसी दशा में नामवर गीतकारों को ऐसे मंचों का बहिष्कार करना चाहिये । जिन पर बहुत ही घटिया दर्जे के हास्य कवियों का जमवाडा हो । परन्तु , नहीं उन्हें तो पैसा चाहिये । मैं जहां तक समझता हूं हास्य-व्यंग के कवियों को हम नहीं सुधार सकते परन्तु नितांत ही चौथे दर्जे के श्रोताओं को सुधारना जरूरी है जो सबसे आगे बैठते हैं और कविता को मूंगफली खाते-खाते सुनते हैं । सवाल है कि कूसूरवार कौन है- आप या वे घटिया दर्जे के हास्य कवि ?’’
आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल : ‘’कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है और जगत् के बीच क्रमश: उसका अधिकाधिक प्रसार करती हुई उसे मनुष्‍यत्‍व की उच्‍च भूमि पर ले आती है ।’’


श्री राम अधीर जी के सवाल का जवाब देना हमारे लिये लाजमी भले ही न हो पर, उनके इस सवाल पर चिंतन आवश्यक है । आज कविता के स्तर कवि सम्मेलनों में परोसे जाने वाली फूहडता व नाटकीय भव्यता एवं इनकी बारंबारता को देखते हुए ही संपादक नें इसे ‘’भजन मंडली’’ मत बनाओ कहा है, और इन आयोजनों के कर्णधारों पर बरसते हुए वे कहते हैं - ’’मतलब यह कि जिन्हें कुछ लिखने-पढने से मतलब नहीं उनको आप कवि बनाने की ठेकेदारी कर रहे हैं, तो फिर यही उचित रहेगा कि गीत, गजल को मरने दीजिये । किसी की रचना को आपने कमजोर कह दिया तो वह नाराज हो जायेगा, यही डर आपको खाये जा रहा है तो गीत-गजल को बर्बाद करने वालों का आपकी ओर से अभिनन्दन होना चाहिये ।‘’

अजीत कुमार सिन्‍हा : ‘’वह उस तरह का साहित्‍य भी रचने लगता है, जो बहुत बार, शायद निकलता तो उसी के भीतर से है, पर खुद उसके भी अंतर में पहुँच नहीं पाता । औरों की बात उठाना यहॉं इसलिये मौजूं नहीं जान पडता, क्‍योंकि ऐसा कवि ‘उपजहि अनत, अनत छबि लहहीं (रचना उत्‍पन्‍न हो कवि के मन में, पर शोभा पाए अन्‍य लोगों के मन में) को बेमानी समझकर, रचना को एक ऐसा इंद्रजाल मानने लगा है, जो न कहीं उत्‍पन्‍न हो, न कहीं फैले, लेकिन ‘वाह’वाह’ चारो तरफ से सुनाई दे ।‘

आजकल इन भजन मंडलियों में शिरकत करने के लिये लालायित अनेकों कवि भी कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो गए हैं, दो शब्दों की तुकबंदी की या आडे तिरछे भावों को एक साथ मिलाकर काकटेल तैयार किया कागज में उकेरा और हो गए कवि, अब झेलो इन्हें । वर्तमान कविता पर हाल ही में प्रकाशित कृति ‘’इधर की हिन्दीं कविता’’ के लेखक अजीत कुमार सिन्हा जी जो अग्रज पीढी की महिला गीत-कवयित्री स्व.सुमित्रा कुमारी सिन्हा के प्रतिभासंपन्न सुपुत्र हैं, नें अपने लेख ‘गांव के लोगों तक कैसे पहुँची कविता’ पर समीक्षकों के दायित्व पक्ष पर जो विचार व्यक्त, करते हैं उसकी आज अहम आवश्यकता है - ’’बहरहाल, कवि क्या लिखे और कैसे लिखे  – तुलसीदास और शेखर की तरह अथवा केशवदास और पुंडरीक की तरह । इसके बारे में, न मैं कुछ कह सकने की स्थिति में हूँ, न यह अधिकार लेना चाहता हूं । लेकिन सोंचता जरूर हूं कि कविता के समीक्षक पर इसकी जिम्मेदारी है कि आज की कविता की विशेषता का विवेचन ऐसी भाषा में और इस ढंग से करें कि कविता का सौंदर्य अधिक से अधिक लोगों के लिए उजागर हो सके ।‘’

इस विषय पर चर्चा करते हुए हमारे एक ब्लाग पाठक मित्र कहते हैं कि यह बात तो तुम्हारे हिन्दी ब्‍लाग जगत में भी हो सकता है । तब वहां भी ऐसे समीक्षकों के टिपियाने की आवश्य‍कता पडेगी नहीं तो वहां भी कविता के नाम पर आरती संग्रह प्रकाशित होने लगेंगें । हमने कहा अभी हिन्‍दी ब्लाग में ऐसी स्थिति नहीं आई है और जब आयेगी तब तक समीक्षक लोग भी ब्‍लाग जगत में आ जायेंगें । क्‍या सोंचते हैं आप ????.

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छत्‍तीसगढ़ में शिवनाथ नदी के किनारे बसे एक छोटे से गॉंव में जन्‍म, उच्‍चतर माध्‍यमिक स्‍तर तक की पढ़ाई गॉंव से सात किलोमीटर दूर सिमगा में, बेमेतरा से 1986 में वाणिज्‍य स्‍नातक एवं दुर्ग से 1988 में वाणिज्‍य स्‍नातकोत्‍तर. प्रबंधन में डिप्‍लोमा एवं विधि स्‍नातक, हिन्‍दी में स्‍नातकोत्‍तर की पढ़ाई स्‍टील सिटी में निजी क्षेत्रों में रोजगार करते हुए अनायास हुई. अब पेशे से विधिक सलाहकार हूँ. व्‍यक्तित्‍व से ठेठ छत्‍तीसगढि़या, देश-प्रदेश की वर्तमान व्‍यवस्‍था से लगभग असंतुष्‍ट, मंच और माईक से भकुवा जाने में माहिर.

गॉंव में नदी, खेत, बगीचा, गुड़ी और खलिहानों में धमाचौकड़ी के साथ ही खदर के कुरिया में, कंडिल की रौशनी में सारिका और हंस से मेरी मॉं नें साक्षात्‍कार कराया. तब से लेखन के क्षेत्र में जो साहित्‍य के रूप में प्रतिष्ठित है उन हर्फों को पढ़नें में रूचि है. पढ़ते पढ़ते कुछ लिखना भी हो जाता है, गूगल बाबा की किरपा से 2007 से तथाकथित रूप से ब्‍लॉगर हैं जिसे साधने का प्रयास है यह ...