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वर्जित विषय : सांस्कृतिक उत्थान का प्रतीक है कण्डोम

जगतजननी माँ जगदम्बा की नवराती में भब्य पंडाल सजे हैं। बड़े होटलों, फाइव स्टार धर्मशालाओं और इंद्र की नगरी की भांति सर्व सुविधासंपन्न आश्रमों में रास गरबा करते खाए अघाए लोग नाच रहे हैं। गीतगोविन्दम के कृष्ण, राधा और गोपियाँ आस्था और भक्ति का संदेस देते जीवंत हो गए हैं।
ऐसे भक्तिमय समय में असंगत एवं असार्वजनिक बात सुना। कल जब शहर के पॉश कहे जाने वाले कालोनी में स्थित एक दवाई दुकान के मालिक ने बताया तो आश्चर्य हुआ।
"इन नौ दिनों में गर्भनिरोधक की बिक्री का आकड़ा सर्वाधिक होता है। साल भर में जितने पैकेट की बिक्री होती है उतनी ही इन नौ दिनों में बिक जाती है।"
@तमंचा रायपुरी

इसे फेसबुक पर प्रकाशित करने पर अधिकतम मित्रों नें स्वीकार किया किया कि इसमें सौ प्रतिशत सत्यता है. कमेंट इस प्रकार हैं —

Ashok Sharma - हां, ये दुखद सच है।
सूर्यकांत गुप्ता - तोर पोस्ट ल पढ़त हौं अऊ "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान. कितना बदल गया इंसान" वाले गाना रेडियो म सुनत हौं.....
रमेश चौहान - गंभीर, किन्तु कटु सत्य ये वासना के पुजारी की माया है
Swadha Sharma - आपकी इस पोस्ट से प्रेरणा मिली कि,, महूँ कुछ चेपव facebook माँ.
Anubhav Sharma - देशी वेलेंटाईन डे...की तरह गरबा रास...मुडिया पर्व ककसार की तरह....नैतिक रूप से इसके स्वरुप में नही जाऊंगा ...पर युवा पीढ़ी ने अपने लिए ये स्पेस निकाला है...
Kewal Krishna - स्वाभाविक है
Santosh Kumar — ये कड़वा सच है...
Pushpa Dubey — संजीव भैया जी लगता है अब भक्ति भी फ़ेसन ( दिखावा ) बन गयी है... असमाजिक तत्व भक्ति के आड़ में कुछ भी कर रहे हैं । ये वर्जित विषय नहीं है भैय्या जी आज के युग का ज्वलंत मुद्दा है ये...
नवीन तिवारी अमर्यादित तिवारी — <, आधुनिकता का पर्याय >>> <, अंधानुकरण , पर आपैं को सामाजिक सांस्कृतिक बताना ,, <, इसके आध में व्यभिचारी की छूट पाना ,, फिर सुरक्षा के आगे ,, ये सब जरुरी है
याज्ञवल्क्य वशिष्ठ — सहमत
Sanjeev Sahu — शत प्रतिशत सत्य बात है
Cap. Naveen Sahu — Kai po che फिल्म में भी....
Kaushal Mishra — ये कैसा भक्ति संदेश..... ??? बस पंडाल के बाहर दवा विक्रेता के स्टॉल की कमी रह गई है ... ये दिन भी दूर नहीं...
Lalchand Vaishnav — गरबा जिहाद वाले मन ये तफर ध्यान कैसे नि दये
Manoj Kumar — सत्य है 
Nishant Mishra — सच है ये बात. इस सीजन में गायनकोलॉजिस्ट भी बहुत व्यस्त हो जाती हैं.
Gyan Dutt Pandey सांस्कृतिक उत्थान का प्रतीक है कण्डोम।
Satyapriya Tiwari — गाँव गवई म दुकान नई रहय त ये सब बात पता नई चलय। फेर बिगड़े ब शहर आउ गाँव दुनो जघा के युवा पिढी मन बिगड़ गे हे। 
Kamlesh Verma — संजीव भाई गुजरात में शारदीय नवरात्री के समे मा गर्भनिरोधक के सर्वाधिक बिक्री के बात तो चार -पञ्च साल पहिली ले सुने हाबन,अब तो जादा लाहो लेवत होही.
Vivek Sao — कहीं पढ़ा था की गुजरात में सबसे ज्यादा एबॉर्शन इनही महीनों में होता है...
Pankaj Oudhia — http://www.dnaindia.com/.../report-as-garba-season... As garba season sizzles, condom sales hot up | -
According to an Ahmedabad-based psychiatrist, Dr. Mrugesh Vaishnav, young people enjoy a degree of personal freedom during Navaratri that is rarely granted to them at other times. The slackening of parental rules and supervision allows some of the youth to explore intimacy with the opposite sex. “Young people are excited by the festive mood and as a result, moral barriers are broken,” Vaishnav said. “It can also be viewed as an act of defiance against social norms.”
Amid the raging twirl of hormones, which is viewed with disdain in many quarters, there lies some reassuring news: boys and girls revelling in unmonitored liberty are at least aware of the risks, especially Aids.DNAINDIA.COM 
Sanjeet Tripathi — bhai sahab, yah bat mai 2004 me jab nav bharat me tha tab hi apne lekh me ullekhit kar chuka hun......

बस्तर : घोटुल

लिंगो पेन के भावनाओं के घोड़े
थम से गए है
जम गए हैं खदानों से उड़ते धूल
अट्ठारह वाद्यों में
गुम गए है आख्यान
आदिम गीतों में
शहर के पगधूलि नें कर
दिया है अपवित्र
पवित्र घोटुल को
प्रकृति का स्वर्गीय आनन्द
जहॉं अब कोई नहीं पाता.
अब चेलिक और मोटियारी
हाथों में हाथ ले
नहीं गाते रेला
नहीं उठते पैर
नृत्य के लिए
बेलौसा नहीं सिखाती प्यार
सरदार नहीं लगाता कोई जुर्माना
अब मुरिया बच्चों के लिए
खुल गए हैं स्कूल
जहॉं मास्टर नहीं आता.

... तमंचा रायपुरी

बस्‍तर : रिसता खून

पता नहीं कौन सा साल था वह, बचपन में उम्र क्या थी पता नहीं, वक्त भी पता नहीं, पर उजाला था आसमान में. उनींदी आंखों जब खुली तो सिर में खुजली हो रही थी. हाथ जब बालों में गई तो दर्द हुआ सिर में, दर्द हुआ उंगलियों में, कुछ चिपचिपा महसूस हुआ. झट बालों से बाहर निकले उंगलियों को जब अंगूठे नें छुआ, तो फिर दर्द हुआ. अंगूठे नें महसूस किया, आंखों नें देखा, चिपचिपे द्रव के साथ. कांछ उंगलियों में, सिर में, शरीर में, बाबूजी, दीदी के कपड़ों पर, बस में, चारो तरफ बिखरे थे. बाबूजी के सिर से भी खून बह रहा था पर उन्होंनें मुझे हिफाजत से पकड़ा था. बाहर पेंड ही पेंड, कुछ में लटो में आम, शायद जंगल था. नीचे गहरी खाई, बस का एक पहिया हवा में. पेंड से टकरा गई थी बस, खिड़कियों के शीशे हमारे शरीरों में चुभते हुए बिखर गई थी सड़क पर. बाबूजी नें कहा था एक्सीडेंट हो गया!. मेरे सिर के बालों में घुसे महीन कांछ के तुकड़े, बूंद बूंद खून सिरजा रहे थे. उंगलिंयॉं बार बार सिर खुजाने को बालों की ओर लपकती और बाबूजी मेरा हाथ रोक देते. एक बड़ा तुकड़ा भी गड़ गया था सिर में. दर्द से, जाहिर है, मेरे आंसू निकल रहे थे और मुह से नाद. अगले कुछ पलो में बस से सब अपना अपना सामान लेकर उतर गए. नीचे सड़क पर कांछ के साथ बस के आस पास बिखरे थे आम. बाबूजी के एक हाथ में भारी बैग दूसरे में मेरा हाथ. मैं दर्द भूलकर आम उठाने झुका और एक आम उठा भी लिया. बाबूजी नें अपने बंगाली के कंधे से सिर से आंख में बहते हुए खून को पोंछा और मुझे एक भद्दी सी छत्तीसगढ़ी गाली दी. मर रहे हैं और तुझे आम सूझा है. उन्होंनें शब्दों को आगे जोड़ते हुए कहा, तब तक मेरे खून सने हाथों नें आम को मुह तक पहुचा दिया था. दूसरी बस कब आई, कब हम जगदलपुर पहुंचे, मुझे नहीं पता.

किन्तु आज भी, जब कभी भी, बस्तर के जंगलों में हो रहे मार काट में किसी मानुस के खून बहने की खबर, समाचारें लाती है. मेरी उंगलियॉं मेरे सिर के बालों में अनायास ही चली जाती है. उंगलियॉं महसूसती है, चिपचिपा रिसता खून, और सिर में दर्द होने लगता है.
.. तमंचा रायपुरी.

दलित विमर्श ... द्वन्द

दलित साहित्य और दलित विमर्श का विषय हमारे जैसे अल्पज्ञों के समझ से अभी दूर है। फिर भी थोडा बहुत जो अध्ययन है उसके अनुसार से यह प्रतीत होता है कि इस विषय को वामपंथ ने 'हैक' कर रखा है। इस विषय पर दक्षिणपंथ का या तो ज्यादा योगदान नहीं है या फिर उनके लेखन को जानबूझ कर हासिए पर धर दिया गया है। इस पर आप का क्या विचार है ?

मेरे इस प्रश्न का उत्तर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता, पूर्व सांसद, विचारक एवं लेखक डॉ.विजय सोनकर शास्त्री ने विभिन्न उदाहरणों के साथ विस्तार से दिया। उनकी बातों में से कुछ कड़ियाँ रिकार्ड हो पाई जिसमे से एक, यह कि, आधुनिक समय में वेद पर तर्क से ज्यादा कुतर्क हुए। दूसरा यह कि, मुस्लिम आक्रमणकारियों, शासको और अंग्रेजो नें तथाकथित दलित समाज का बीज अपने स्वार्थ के कारण बोया। और तीसरा यह कि, कागजो में दलित विमर्श करने के बजाय दलितों की समस्याओं को दूर करने, उन्हें मुख्य धारा में लाने का प्रयास होना चाहिए।

डॉ. शास्त्री ने वेद, विज्ञान, समरस समाज सहित दलित समाज पर बीसियों ग्रन्थ लिखे हैं। कल दुर्ग में हमारी संस्था टोटल लाइफ़ फाउंडेशन के द्वारा आयोजित एक अखिल भारतीय व्याख्यान में वक्ता के रूप में वे आमंत्रित थे। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डॉ.सच्चिदानंद जोशी, कुलपति पत्रकारिता वि.वि.रायपुर थे जिन्होंने प्रकृति, पर्यावरण और भारतीय संस्कृति पर सारगर्भित वक्तव्य दिया। डॉ. जोशी एवं डॉ.शास्त्री के व्याख्यान पर चर्चा फिर कभी।

अभी यह कि, दोपहर डॉ.शास्त्री के साथ दुर्ग पत्रकार संघ का प्रेस वार्ता हुआ। वार्ता के अंत में एक तिलकधारी पत्रकार नें मुझसे डॉ.शास्त्री का पूरा नाम पूछा। मैंने बताया, वो 'सोनकर' पर अटक गए। मैंने उनके सम्बन्ध में जब संक्षिप्त परिचय दिया तो वे 'शास्त्री' पर व्यंग मुस्कान बिखेरते हुये, 'खटिक' को स्थापित करते रहे। उनकी घडी स्वल्पाहार तक उसी शब्द पर अटकी रही। हालाँकि, किसी भी पत्रकार नें उसकी बातों को तूल नहीं दिया .. किन्तु .. दलित विमर्श ... द्वन्द जारी रहा।

तमंचा रायपुरी

चिपचिपा रिसता खून

पता नहीं कौन सा साल था वह, बचपन में उम्र क्या थी पता नहीं, वक्त भी पता नहीं, पर उजाला था आसमान में. उनींदी आंखों जब खुली तो सिर में खुजली हो रही थी. हाथ जब बालों में गई तो दर्द हुआ सिर में, दर्द हुआ उंगलियों में, कुछ चिपचिपा महसूस हुआ. झट बालों से बाहर निकले उंगलियों को जब अंगूठे नें छुआ, तो फिर दर्द हुआ. अंगूठे नें महसूस किया, आंखों नें देखा, चिपचिपे द्रव के साथ. कांछ उंगलियों में, सिर में, शरीर में, बाबूजी, दीदी के कपड़ों पर, बस में, चारो तरफ बिखरे थे. बाबूजी के सिर से भी खून बह रहा था पर उन्होंनें मुझे हिफाजत से पकड़ा था. बाहर पेंड ही पेंड, कुछ में लटो में आम, शायद जंगल था. नीचे गहरी खाई, बस का एक पहिया हवा में. पेंड से टकरा गई थी बस, खिड़कियों के शीशे हमारे शरीरों में चुभते हुए बिखर गई थी सड़क पर. बाबूजी नें कहा था एक्सीडेंट हो गया!. मेरे सिर के बालों में घुसे महीन कांछ के तुकड़े, बूंद बूंद खून सिरजा रहे थे. उंगलिंयॉं बार बार सिर खुजाने को बालों की ओर लपकती और बाबूजी मेरा हाथ रोक देते. एक बड़ा तुकड़ा भी गड़ गया था सिर में. दर्द से, जाहिर है, मेरे आंसू निकल रहे थे और मुह से नाद. अगले कुछ पलो में बस से सब अपना अपना सामान लेकर उतर गए. नीचे सड़क पर कांछ के साथ बस के आस पास बिखरे थे आम. बाबूजी के एक हाथ में भारी बैग दूसरे में मेरा हाथ. मैं दर्द भूलकर आम उठाने झुका और एक आम उठा भी लिया. बाबूजी नें अपने बंगाली के कंधे से सिर से आंख में बहते हुए खून को पोंछा और मुझे एक भद्दी सी छत्तीसगढ़ी गाली दी. मर रहे हैं और तुझे आम सूझा है. उन्होंनें शब्दों को आगे जोड़ते हुए कहा, तब तक मेरे खून सने हाथों नें आम को मुह तक पहुचा दिया था. दूसरी बस कब आई, कब हम जगदलपुर पहुंचे, मुझे नहीं पता.

किन्तु आज भी, जब कभी भी, बस्तर के जंगलों में हो रहे मार काट में किसी मानुस के खून बहने की खबर, समाचारें लाती है. मेरी उंगलियॉं मेरे सिर के बालों में अनायास ही चली जाती है. उंगलियॉं महसूसती है, चिपचिपा रिसता खून, और सिर में दर्द होने लगता है.
.. तमंचा रायपुरी.


हमारी भाषा एवं संस्कृति का जो मान नहीं रखेगा उसे हम जूता मारेंगें

पिछले दिनों कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष भूपेश बघेल के द्वारा मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के लिए की गई टिप्पणी 'परोसी के भरोसा लईका पैदा करे' पर बहुत शोर शराबा हुआ एवं मीडिया नें भी इसे बतौर समाचाार लगातार छापा. इस बीच कुछ पत्रकार मित्रों के फोन भी आए कि इस कहावत पर जानकारी दूं एवं इस पर त्वरित टिप्पणी भी दूं. किन्तु मेरी निजी व्यस्तता व समयाभाव के कारण कुछ लिख नहीं पाया. भूपेश बघेल नें अपनी टिप्पणी 'परोसी के भरोसा लईका पैदा करे' पर सफाई दिया कि यह छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति है जिसका अर्थ है किसी अन्य के श्रम से सफलता प्राप्त करना. धान के मूल्य वृद्धि के लिये केन्द्र को लिखे पत्र को आधार बनाकर बधेल नें मुख्यमंत्री को घेरा था.

केन्द्र के पैसे से मुख्यमंत्री वाहवाही लूटना चाहते हैं इस बात को प्रभावी ढंग से कहने के लिए भूपेश बघेल नें यह टिप्पणी की थी. भाजपा के विजय बघेल नें इसे स्तरहीन व भद्दी टिप्पणी मानते हुए धरना प्रदर्शन भी किए थे. पलटवार करते हुए भूपेश बघेल टिप्पणी के विरोध को छत्तीसगढ़ी भाषा संस्कृति का विरोध बताते हुए अपनी बात पर अड़े रहे.

जब पत्रकार मित्रों नें इस मुहावरे/लोकोक्ति का जिक्र किया तभी एकबारगी दिमाग नें इसे छत्तीसगढ़ी मुहावरा/लोकोक्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया था तो इस बीच मै इसे पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में ढ़ूढ़ने का काम भी करता रहा. किताबों में यह ना तो मुहावरे के रूप में मिला ना ही लोकोक्ति के रूप में. गांवों में कुछ फोन भी घुमाया, तब तक समाचार पत्रों नें बात फैला दी थी और लगा कि लोग राजनीति से प्रेरित होकर जवाब दे रहे हैं. कुछ स्पष्ट लोगों नें कहा कि यह ना तो प्रचलित मुहावरा है और ना ही प्रचलित लोकोक्ति, यह हो सकता है कि यदा कदा या किसी गांव विशेष में इसका प्रयोग हो रहा हो किन्तु बहुत बड़े भू भाग में इसका प्रयोग नहीं सुना गया है. इसी कारण इस बात पर छत्तीसगढ़ी के किसी आम—खास नें बयान नहीं दिया. छत्तीसगढ़ी भाषा में कई ऐसे मुहावरे व लोकोक्तियॉं हैं जो अश्लील हैं, किन्तु व्यवहार में उन मुहावरों का प्रयोग सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता. भूपेश बघेल के द्वारा प्रयुक्त टिप्पणी अश्लील नहीं है, किन्तु इसका प्रयोग मुख्यमंत्री के लिए सार्वजनिक मंच से नहीं किया जाना चाहिए था.

कल सदन में हुए बहस में भूपेश नें इसी बात को संयमित तरीके से कहा. उनके मुख्यमंत्री के अन्य प्रदेश से आने की बात पर प्रेम प्रकाश पाण्डेय की बहस हम छत्तीसगढ़ियों के लिए सामान्य बात नहीं है. यह सत्य है कि छत्तीसगढ़ के मूल निवासी आदिवासी ही हैं बाकी सभी इस भू भाग में बाद में ही आए हैं किन्तु जो हमारी भाषा एवं संस्कृति का मान नहीं रखते वहीं असल में गैर छत्तीसगढ़िया हैं. इसमें कोई दो मत नहीं कि मुख्यमंत्री ठेठ छत्तीसगढ़िया हैं, हॉं यह अवश्य है कि मंत्रीमंडल के कुछ सदस्य सिर्फ दस्तावेजी आधार पर छत्तीसगढ़िया हैं. ऐसे दस्तावेजी छत्तीसगढ़िया यदि छत्तीसगढ़ी भाषा एवं संस्कृति का मान नहीं रख सकेंगें तो जनता मौके पर मजा चखाती भी है. प्रेमप्रकाश पाण्डेय के संबंध में कहा जाता था कि पिछले विधान सभा अध्यक्ष काल में उन्होंनें अपने पास बिहारियों का आभामण्डल बना कर रखा था, छत्तीसगढ़ी भासियों का पीपीपी के बंगले में कोई पुछंतर नहीं था, इसीलिये जनता नें उन्हें हरा दिया था. इस विधान सभा चुनावी समय में कुछ दिनों मैंनें पीपीपी के बंगले एवं क्षेत्र का हालचाल लिया है जहॉं छत्तीसगढ़ियों के लिए आशा की किरण नजर आई है. उन्होंनें अपने व्यक्तित्व पर लगे बहुत सारे तथाकथित मिथकों को तोड़ा है और जीत के आए हैं. वैसे राजनीति और प्रेम में सब जायज है. तो हम क्यूं फोकट में बहसियायें.

छत्तीसगढ़ के भिलाई जैसे औद्यौगिक क्षेत्रों में विभिन्न प्रदेशों के लोग रहते हैं, जिनमें से अधिकतम लोग छत्तीसगढ़ी बोल नहीं सकते. छत्तीसगढ़ी नहीं बोल पाना कोई अपराध नहीं है, हमारी भाषा का मान नहीं रखना अपराध है. खासकर ऐसे क्षेत्रों के नवधनाड्यों के घरों में यह परिपाटी के तौर पर देखनें को मिलता है क्योंकि उनके घरों में काम करने वाले निचले तबके के कर्मचारी छत्तीसगढ़ी भाषी होते हैं. वे समझते हैं कि छत्तीसगढ़ी दीनों की भाषा है, इस संबंध में एक अनुभव मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं. लगभग सात—आठ साल पहले आरकुट के दिनों में मैंनें आरकुट में छत्तीसगढ़ी मुहिम चलाई थी तब भिलाई के एक बहुत ख्यात डाक्टर की युवा पुत्री नें अंग्रेजी में मुझे कमेंट किया था कि छत्तीसगढ़ी गई उसके 'एश होल' में. मैं इसे तूल नहीं देना चाहता था और उस समय प्रतिरोध के तरीको ​का मुझे भान नहीं था इसलिए चुप रहा. किन्तु अब जब नुक्कड़ से लेकर सदन तक बात छत्तीसगढ़िया की आ गई तो इस पर सनद के तौर पर कुछ लिख देना आवश्यक जान पड़ा. सो नोट किया जाए हमारी भाषा एवं संस्कृति का जो मान नहीं रखेगा उसे हम जूता मारेंगें.

तमंचा रायपुरी



तुरते ताही : कविता का सौंदर्य


पिछले दिनों भिलाई की बहुचर्चित कवियत्री व समाज सेविका नीता काम्बोज ‘सिरी’ के पहले कविता संग्रह का विमोचन हुआ जिसमें शामिल होने का सौभाग्यी प्राप्त हुआ. खुशी हुई कि कवियत्री का पहला कविता संग्रह प्रकाशित हो रहा है. इसके पूर्व मैं कवियत्री नीता काम्बोकज ‘सिरी’ के गीतों को कवि सम्मेलन और गोष्ठियों में सुनते रहा हूं. जहॉं उनके कुछ गीतों में व्याक्तिगत तौर पर मुझे उथली तुकबंदी एवं कविता की अकादमिक कसौटी की कमी नजर आती थी. उनका व्यक्तित्व‍ बेहद सहल है और उनमें बच्चों सी निश्छलता है. इस संग्रह के प्रकाशन के बाद मैं आशान्वित था कि कवियत्री नें अपनी कविताओं को प्रकाशन एवं मंच के अनुरूप अलग अलग छांटा होगा एवं अपनी श्रेष्ठ कविताओं को प्रकाशित करवाया होगा जिसमें उनकी कविताई का उचित मूल्यांकन हो पायेगा, क्योंकि उनमें कविता की पूरी समझ नजर आती है. इसके अतिरिक्त दूसरा तथ्य यह भी था कि यह कविता संग्रह ‘दृष्टिकोण’ डॉ.सुधीर शर्मा के वैभव प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है तो निश्चित है डॉ.सुधीर शर्मा नें कविताओं की वर्तनीगत व्याकरणिक भूलों को अकादमिक स्वरूप अवश्य प्रदान किया होगा. तीसरे तथ्य के रूप में अशोक सिंघई का भूमिका लेखन अहम रहा है क्योंकि अशोक सिंघई छत्तीसगढ़ के ऐसे कवि हैं जो पूरे भारत में हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि के रूप में जाने जाते हैं, यहॉं मैं यह स्पष्ट कर दूं कि डॉ. विमल कुमार पाठक नें भी इस किताब पर अपनी लेखनी बिखेरी है किन्तु मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें हिन्दी कविता के संबंध में योग्य टिप्पणीकर्ता स्वीकार नहीं करता, इस पर बातें कभी और.

विमोचन कार्यक्रम में संकलन के संबंध में आमंत्रित वक्ताओं में अशोक सिंघई, डॉ.निरूपमा शर्मा, डॉ.रमेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ.नलिनी श्रीवास्तव नें विस्तार से अपनी समीक्षात्मक टिप्प्णियॉं दी एवं आधार वक्तव्य सरला शर्मा नें दिया. सभी नें नीता काम्बोज ‘सिरी’ की कविताओं को मुक्त‍ कंठ से सराहा. सरला शर्मा नें पूरे संग्रह में नारी अस्मिता का ध्वज फहराते नीता काम्बोज ‘सिरी’ की उस कविता का जिक्र किया जिसमें उसने पति की दूसरी पत्नी सौत पर कविता लिखी है. सरला शर्मा नें अपनी जानकारी के अनुसार इस कविता को किसी नारी के द्वारा लिखी गई अपने ढ़ंग की निराली कविता माना और कहा कि यह अकेली कविता इस संग्रह की जान है यह कविता कवियत्री को दीर्घजीवी बनायेगी. हिन्दी के वरिष्ठ कवि अशोक सिंघई नें अपने वक्तव्यव में बहुत सहज रूप से बतलाया कि अनुभवजन्य अतीत व जीवन की विसंगतिपूर्ण घटनाओं से उत्प‍न्न‍ भावों में कविता सृजित हो जाती है. उन्होंनें कविता को साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित होने में लगने वाले समय एवं कविता की श्रेष्ठता पर विस्तार से प्रकाश डाला. मैं स्पष्ट‍ कर दूं कि अशोक सिंघई यह बातें नीता काम्बोज ‘सिरी’ की कविताओं के संबंध में ही बोल रहे थे, उन्होंनें लक्षित रूप से नीता काम्बोज ‘सिरी’ को मंचीय कविता से परे साहित्य के द्वार में प्रवेश का राह बता रहे थे. नीता काम्बोज ‘सिरी’ नें अशोक सिंघई के इन गूढ़ बातों को कहॉं तक अमल में लाया यह तो उनकी दूसरी किताब में नजर आयेगी. बहरहाल इस कार्यक्रम नें सिद्ध किया कि नीता काम्बोज ‘सिरी’ को अपनी कविताओं के प्रति और भी गंभीर होने की जरूरत है.

कविता बहुत ही गंभीर विधा है इसे रचने वाले एवं पढ़ने वाले दोनों की गंभीरता से ही कविता अपने सामाजिक स्वरूप को व्यापक तौर पर व्यक्त कर पाती है, कविता का सौंदर्य तब और निखरता है. मंचीय कविता को साधना है साथ ही राजनैतिक व्यक्तित्व निखारना है तो स्थानीय मीडिया एवं स्थानीय चाटुकारों का सामंजस्य आवश्यक है. किन्तु जब हम जिसे कविता कह रहे हैं उसे साधना है तो इन सबको एक तरफ रख कर मुक्तिबोधों, पाशों, धूमिलों, नार्गाजुनों से लेकर विनोद कुमार शुक्लों, कमलेश्वरों, नरेश सक्सेनाओं, निशांतों, वर्तिका नंदाओं, आदि इत्यादि की कविताओं से भी गलबंहियां लेना पडेंगा. तभी डॉ.ओम निश्चल जैसे कविता के निर्मम आलोचकों की नजरों में उतरते हुए साहित्य जगत में स्थान मिल पायेगा. तब निश्चित है कि उनकी कविताओं को बिना नमस्कार चमत्कार के स्था‍नीय मीडिया ही नहीं राष्ट्रीय मीडिया भी तवज्जों देगी.

विमोचन कार्यक्रम में नीता आमंत्रित विशिष्‍ठ अतिथियों को दृष्टिकोण की प्रति हस्‍ताक्षर कर कर के प्रदान कर रही थी, हम इंतजार कर रहे थे कि हमें भी अब मिली कि तब पर जब प्रति नहीं मिली तब पता चला कि हमारी औकात क्‍या है. :) डॉ.सुधीर शर्मा नें कार्यक्रम में मेरे पहुचते ही मंच से मेरा स्‍वागत किया था और मेरे तथाकथित सम्‍मान में दो शब्‍दों के कसीदे भी पढ़े थे तो लगने लगा था कि विशिष्‍ठ भले ना सहीं शिष्‍ठ तो बने रहूं. (दो ठो स्‍माईली); विमोचन कार्यक्रम  के उपरांत बख्शी सृजन पीठ के द्वारा ‘दृष्टिकोण’ की एक प्रति नीलम चंद जी सांखला, दंतेवाड़ा को पहुचाने के लिए मुझे डकहार के रूप में प्रदान किया गया. यह मेरे लिए बहुत ही बड़े सौभाग्य की बात थी कि एक नजर कविताओं पर डाल सकूं किन्तु आपाधापी में मैं इस संग्रह की कविताओं को पढ़ नहीं पाया. संग्रह पढ़ने के बाद कोशिस करूंगा कि कुछ और लिखूं. अभी कवियत्री नीता काम्बोज ‘सिरी’ को इस संग्रह के लिए अनेकानेक शुभकामनायें.

तमंचा रायपुरी

तुरते ताही : कोदो दे के पढ़ई

रविशंकर विश्वविद्यालय के द्वारा अमहाविद्यालयीन छात्रों के लिए स्नातक एवं स्नातकोत्तर के परीक्षाओं के लिए परीक्षा फार्म इन दिनों महाविद्यालयों में आने वाले है. हम इसी का पता लगाने पिछले दिनों शासकीय विज्ञान महाविद्यालय दुर्ग गए वहॉं हमारे सहपाठी नरेश दीवान क्रीड़ा अधिकारी हैं वे मिल गए. आने का कारण पूछा तो हमने बतलाया कि एम.ए. का फार्म भरना है तो पता करने आए थे. उन्होंनें तपाक से कहा कि पिछले साल भी तो तुमने एम.ए.हिन्दी की परीक्षा दी थी ना और तुम्हारा परसेंट भी अच्छा आया था, तो अब फिर क्यों.

नरेश नें प्रतिवाद किया कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं, बेकार में लोग अपना समय गवांते हैं. उन्होंनें किसी स्कूल शिक्षक का उदाहरण देते हुए बताया कि वह आठ विषयों में एम.ए. किया है, किन्तु स्कूल शिक्षक ही है. उसने अपने घर के सामने नाम पट्टिका में आठ एम.ए.का उल्लेख बड़े शान से किया है. नरेश का कहने का मतलब था कि उस स्कूल शिक्षक ने किसी विशेष विषय में विशेषज्ञता हासिल नहीं की इसलिए नौकरी के क्षेत्र में उसका विकास नहीं हो पाया. नरेश नें आगे यह भी बताया कि उन आठो एम.ए. में स्कूल शिक्षक का प्राप्तांक प्रतिशत 45 पार नहीं कर पाया जिसके कारण वे आठो डिग्रियॉं उसके पदोन्नति या दूसरी नौकरी में काम नहीं आ पाए. नरेश मुझे ज्यादा महाविद्यालयीन डिग्री लेने में समय बर्बाद करने के बजाए विषय विशेषज्ञता की सलाह दे रहा था.

तुरते ताही : छत्तीसगढ़ी में एम.ए. का श्रेय

जब से रविशंकर विश्वविद्यालय में छत्तीसगढ़ी में एम.ए. पाठ्यक्रम आरंभ करने की घोषणा आम हुई है बहुत सारे छत्तीसगढ़ के खास साहित्यकार इसका श्रेय स्वयं लेने की होड़ करते नजर आ रहे है. कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ ही दुर्ग के एक युवा साहित्यकार को इस बात की खुशफहमी है कि स्वयं डॉ.दुबे नें इसका श्रेय उन्हें दे दिया है वहीं राजभाषा आयोग भी मुफ्त में इसे भुनाने का अवसर नहीं गवांना चाहता. मैं स्वयं अपने आप को इसका श्रेय देता हूं क्योंकि मैंनें भी छत्तीसगढ़ी में एम.ए. पाठ्यक्रम होना चाहिए यह बात एक बार अपने दोस्तों से की थी. जो भी हो विश्वविद्यालय नें इसे आरंभ किया यह सराहनीय पहल है. इसके लिए विश्वविद्यालय के डॉ.व्यासनारायण दुबे एवं कुलपति डॉ.शिवकुमार पाण्डेय को ही असल श्रेय जाता है.

तुरते ताही 2 : राजभाषा आयोग के मंच में डॉ.पालेश्वर शर्मा जी के उद्बोधन पर मेरी असहमति एवं प्रतिरोध


पिछले 28 नवम्बर को छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के अवसर पर रायपुर में दो प्रमुख कार्यक्रम आयोजित हुए, एक सरकारी एवं दूसरी असरकारी. सौभाग्य से असरकारी कार्यक्रम की रिपोर्टिंग लगभग सभी संचार माध्यमों नें प्रस्तुत किया.

सरकारी कार्यक्रम छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के द्वारा संस्कृति विभाग के सभागार में आयोजित था. हम यहॉं लगभग अनामंत्रित थे किन्तु सरला शर्मा जी नें हमें इस कार्यक्रम में आने का अनुरोध किया था तो हम उनके स्नेह के कारण वहॉं पहुच गए थे. वैसे राहुल सिंह जी के रहते संस्कृति विभाग में हमारी जबरै घुसपैठ होती रही है तो हम साधिकार कार्यक्रम में सम्मिलित हो गए. कुर्सी में बैठते ही लगा कि मंचस्थ आयोग के सचिव पद्म श्री डॉ.सुरेन्द्र दुबे नें एक उड़ती नजर हम पे मारी है, निमंत्रण नहीं दिया फिर भी आ गया. छत्तीसगढ़ी भाषा के कार्यक्रमों में पद्म श्री डॉ.सुरेन्द्र दुबे की मुख मुद्रा कुछ इस तरह की होती है कि सामने जो आडियंस बैठी है वो रियाया है, और वे अभी अभी व्यक्तित्व विकास के रिफ्रेशर कोर्स से होकर आए हैं. इसलिए हम एक पल को सहम गए कि इन्होंनें देख लिया, पहचान गए कि नास्ते का डिब्बा डकारने वाला आ गया. इसी उहापोह में थे कि सचमुच में नास्ते का डिब्बा आ गया, हमने ना कही तो डिब्बा बांटने वाले नें जबरदस्ती हाथ में पकड़ा दिया. हम चाह रहे थे कि इस घटना को भी पद्म श्री देखें किन्तु बांटने वाला कुछ ऐसे खड़ा था कि डॉक्टर साहब देख नहीं पाये. बहुत देर तक डिब्बा हाथ में लिए बैठे रहे फिर ज्यादा सोंचने के बजाए सभी आमंत्रित अतिथियों की भांति रसमलाई का लुफ्त उठाने लगे.

यह कार्यक्रम चुनाव आचार संहिता की अवधि में हो रहा था इस कारण आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थे. कार्यक्रम में जब हम पहुंचे थे तब डॉ.विनय कुमार पाठक जी का उद्बोधन चल रहा था जो राजभाषा आयोग के शब्दकोश एवं प्रयोजनामूलक छत्तीसगढ़ी के विकास में भावी योजनाओं के संबंध में था. इसके बाद कार्यक्रम का संचालन डॉ.सुधीर शर्मा नें आरंभ किया और रविशंकर विश्वविद्यालय के कुलपति शिवकुमार पाण्डेय जी नें अपना उद्बोधन दिया.

इसके बाद प्रमुख वक्ता के रूप में पालेश्वर शर्मा जी नें अपना उद्बोधन आरंभ किया. पालेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ़ी भाषा के वरिष्ठ विद्वान हैं, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, साहित्य और परम्परा के वे जीते जागते महा कोश हैं. हम उनसे छत्तीसगढ़ के संबंध में सदैव नई जानकारी प्राप्त करते रहे हैं किन्तु राजभाषा आयोग के इस कार्यक्रम में पालेश्वर शर्मा जी के लम्बे एवं उबाउ उद्बोधन में मोती छांटने की सी स्थिति रही. मैं हतप्रभ था कि यह पालेश्वर शर्मा जी पर वय का असर था या तात्कालिक मन: स्थिति, कुछ समझ में नहीं आया. संचालक को उनके उद्बोधन के बीच में ही पर्ची देना पड़ा पर पालेश्वर जी अपने रव में बोलते ही रहे. मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं किन्तु उन्होंनें जो 28 नवम्बर को छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के मंच से अपना वक्तव्य दिया उसमें से अधिकतम बातें उस मंच एवं स्वयं पालेश्वर जी की गरिमा के अनुकूल नहीं थी, मेरी असहमति एवं प्रतिरोध दर्ज किया जाए.

तमंचा रायपुरी

तुरते ताही 1 : नये छत्तीसगढ़ी वेब ठिकानों का स्वागत

इस बात को स्वीकारने में मुझे कोई गुरेज नहीं कि लोक भाषा छत्तीसगढ़ी के वेब पोर्टल गुरतुर गोठ डॉट कॉम के संपादन से मुझे बहुत कम समय में लोक साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिली. यह प्रतिष्ठा मुझे मेरे लगातार संवेदनशील और लीक से हटकर छत्तीसगढ़ी लेखन के बावजूद भी नहीं प्राप्त हो पाती जो मुझे इस पोर्टल के संपादन से प्राप्त हुई. हालांकि इसके पीछे मेरी जुनूनी लगन और अपनी भाषा के प्रति प्रेम का जजबा साथ रहा. मुझे इसे निरंतर रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी, वेब इथिक व कानूनी पेंचों को ध्यान में रखते हुए वेब आरकाईव में पड़े एवं पीडीएफ फारमेट की रचनाओं को नया वेब रूप प्रदान करना पड़ा. सैकड़ों पेजों की रचनाओं को परिवार के तानों के बावजूद टाईप करना पड़ा. जो भी हो मेरी तपस्या का फल मुझे मेरे पोर्टल के हजारों पाठकों के रूप में मिला.

मेरी नेट सक्रियता के शुरूआती समय से ही इच्छा रही कि छत्तीसगढ़ी भाषा और दूसरी लोक भाषाओं के वेब साईट भी नेट में अधिकाधिक संख्या में उपस्थित हो और लोक भाषा के साहित्य भी नेट में अपना स्थान बनायें. स्वप्न धीरे धीरे आकार लेती गई, इसी कड़ी में पिछले कुछ दिनों से लगातार उत्साहजनक व स्वागतेय सूचना प्राप्त हो रहा है कि छत्तीसगढ़ी में कुछ और वेब साईट आने वाले हैं. हम इंतजार कर रहे हैं किन्तु अभी तक कोई ठोस कार्य सामने नहीं आ पा रहा है. कुछ तकनीकि सक्षम साथियों नें अपने ब्लॉग तो बना लिये हैं किन्तु वे पाठकों के कम आवक के कारण उसे अपडेट नहीं कर पा रहे हैं. यह समस्या प्रत्येक नये वेब साईट में आम होता है, हम नेट में डाटा इसलिए नहीं डालते कि उसको तात्कालिक प्रतिसाद मिलेगा किन्तु हम उसे इसलिए डालते हैं कि भविष्य में उससे लोग लाभान्वित होंगें. नये आने वाले सभी वेबसाईटों के माडरेटरों से मेरा अनुरोध है कि उसे वे निरंतर रखें, निश्चित ही यदि हमारे साईट में लोगों के काम की चीज होगी तो वे उसे खोजते हुए आयेंगें ही. इस संबंध में अहम बात यह ध्यान रखें कि इसके लिए किसी डोमेन और होस्टिंग की आवश्यकता नहीं. मुफ्त के ब्लॉग से भी आप भाषा और साहित्य की सेवा कर स​कते हैं, 500 रू. के डोमेन से ब्लॉग मैपिंग कर स्वयं के वेब साईट का भ्रम भी पाल सकते हैं या डोमेन व न्यूनतम 1200 से 7000 रू. के सालाना होस्टिंग के खर्च पर स्वतंत्र वेब पोर्टल संचालित कर सकते हैं.

इस संबंध में यह बात भी ध्यान रखें कि रेहड़ी चलाने वाले के बच्चे पहले शौक में रेहड़ी पेलते हैं, उत्साह में मस्ती करते हैं और जब यही रेहड़ी जब बड़े होने पर दायित्व बन जाती है तो उन्हें उस रेहड़ी के ठेलने में लगने वाले असल बल का भान होता है. किसी वेब साईट या ब्लॉग को आरंभ करना, शुरूआती दौर में उसे लगातार अपडेट करना, टिप्पणियों व क्लिकों से उत्साहित होना इसके बाद में उसे निरंतर रखना भी रेहड़ी चलाने जैसा दायित्व बोध है. नये वेब साईट के माडरेटरों के इस बोध का स्वागत है.
तमंचा रायपुरी
चित्र गो इंडिया डॉट काम से साभार

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छत्‍तीसगढ़ में शिवनाथ नदी के किनारे बसे एक छोटे से गॉंव में जन्‍म, उच्‍चतर माध्‍यमिक स्‍तर तक की पढ़ाई गॉंव से सात किलोमीटर दूर सिमगा में, बेमेतरा से 1986 में वाणिज्‍य स्‍नातक एवं दुर्ग से 1988 में वाणिज्‍य स्‍नातकोत्‍तर. प्रबंधन में डिप्‍लोमा एवं विधि स्‍नातक, हिन्‍दी में स्‍नातकोत्‍तर की पढ़ाई स्‍टील सिटी में निजी क्षेत्रों में रोजगार करते हुए अनायास हुई. अब पेशे से विधिक सलाहकार हूँ. व्‍यक्तित्‍व से ठेठ छत्‍तीसगढि़या, देश-प्रदेश की वर्तमान व्‍यवस्‍था से लगभग असंतुष्‍ट, मंच और माईक से भकुवा जाने में माहिर.

गॉंव में नदी, खेत, बगीचा, गुड़ी और खलिहानों में धमाचौकड़ी के साथ ही खदर के कुरिया में, कंडिल की रौशनी में सारिका और हंस से मेरी मॉं नें साक्षात्‍कार कराया. तब से लेखन के क्षेत्र में जो साहित्‍य के रूप में प्रतिष्ठित है उन हर्फों को पढ़नें में रूचि है. पढ़ते पढ़ते कुछ लिखना भी हो जाता है, गूगल बाबा की किरपा से 2007 से तथाकथित रूप से ब्‍लॉगर हैं जिसे साधने का प्रयास है यह ...